जमशेदपुर की राजनीति में घुलता मज़हबी रंग, क्या चुनाव के नतीजों पर भी असर डालेगा…

Jamshedpur (Abhishek Kumar) :- सूरज चढ़ने को है और जमशेदपुर शहर के कुछ हिस्सों में अजीब सी चहल पहल है. स्वर्णरेखा नदी के किनारे बसा ये खूबसूरत शहर भी इस नई क़िस्म की रौनक़ को देखने के लिये सड़कों पर उतर आया है. क़रीब दो सौ लोगों की इस भीड़ में ज़्यादातर युवा व जवान और कुछ महिलायें शामिल हैं. कुछ “जय श्री राम” का नारा लगा रहे थें तो कुछ स्थानीय प्रसाशन का जमकर विरोध कर रहे थें.

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मज़हब के नाम पर लुभाने की कोशिश
काशिडीह में रहने वाले स्थानीय लोगों ने ऐसा प्रदर्शन कभी नहीं देखा होगा और वे हैरान है की चंद दिनों पहले रामनवमी यात्रा में इतने लोगों की भीड़ नहीं थी. दिलचस्प बात ये भी है की जमशेदपुर में चंद वर्षों से राजनीति की परिभाषा ही बदल गई है. राष्ट्रीय व क्षेत्रीय राजनीतिक दल विभिन्न मज़हब के लोगों को लुभाने में काफ़ी समय दे रहे है.

सांप्रदायिक तनाव
जमशेदपुर के कदमा शास्त्रीनगर में हिंदू-मुस्लिम की आबादी लगभग एक है. कई वर्षों से साथ रहकर ये एक साथ काम कर रहे थें. लेकिन 8 अप्रैल की शाम से चीजें बदल चुकी थी. सांप्रदायिक तनाव में कई समुदायों के दुकानों व कई घर जली. स्थानीय युवक रोहन ने बताया की एक संप्रदाय के द्वारा कथित तौर पर मांस के बांधने की शिकायत की गई थी. अचानक से भीड़ आई और झोपड़ीनुमा दुकान को आग के हवाले कर दिया. इस तनाव में चार-पाँच लाख का नुक़सान हुआ.

पुलिस की थ्योरी
पुलिस का दावा है की सांप्रदायिक तनाव को भड़काने में शामिल सैंकड़ों लोगों की गिरफ़्तारी की जा चुकी है. हिंदू युवा वाहिनी, भारतीय जनता पार्टी, विश्व हिंदू परिषद, भाजमो व अन्य राजनीतिक दलों से जुड़े नेताओं ने कहा स्थानीय प्रसाशन भले ही इस तथ्य को नकार दे, लेकिन राज्य सरकार के इशारों पर ज़िला प्रसाशन काम कर रही है.

हंगामा क्यों बरपा…
कट्टर हिन्दुवादी नेता की छवि वाले अभय सिंह से सूबे की विपक्षी पार्टी भाजपा के केंद्रीय अनुसूचित जनजातीय मंत्री अर्जुन मुंडा, झारखंड भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दीपक प्रकाश, बाबूलाल मरांडी, भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रघुवर दास और जमशेदपुर पूर्वी के विधायक सरयू राय ने जेल में जाकर मुलाक़ात की. इन नेताओं ने स्थानीय ज़िला प्रशासन को कठघरे में खड़ा किया. साथ ही सूबे के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर तुष्टिकरण की राजनीति करने का आरोप भी लगाया और हमलावर हुए.

क़बूलनामा कितना पुख़्ता सबूत
उच्चतम न्यायालय की वरिष्ठ अधिवक्ता अपूर्वा ने हमारी टीम से टेलीफोन पर बातचीत में बताया कि पुलिस के समक्ष दिया गया बयान अदालत में स्वीकार्य नहीं है. यह सब पुलिस के तर्क पर निर्भर करता है. दर्ज प्राथमिकी की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है. पुलिस का तर्क है की यह संवेदनशील जानकारियाँ हैं.

घटनाएं पहले भी होती थी,धर्म का चश्मा
केंद्र सरकार की रिपोर्ट के मुताबिक़ साल1979 में रामनवमी के दिन जमशेदपुर में सांप्रदायिक दंगे में सौ से अधिक लोगों की मौतें हुई थीं.दशकों बाद सांप्रदायिक तनाव की आग में जमशेदपुर दहल सकता था हालाँकि स्थिति को नियंत्रण में कर लिया गया.

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