विश्व आदिवासी दिवस के बहाने आज उनके अधिकारों की रक्षा की बात : मुकेश बिरूवा

Chaibasa (चाईबासा) : विश्व आदिवासी दिवस का थीम ‘स्वैच्छिक अलगाव और प्रारंभिक संपर्क के आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा’ रखा गया है. इसका मतलब यह हुआ कि ऐसे आदिवासी समूह जो मुख्यधारा के लोगों के साथ रहना पसंद नहीं करते हैं. जंगल में प्राकृतिक जीवन जीने में मशगूल रहते हैं और वही समूह इस दुनिया में प्रकृति के संपर्क में पहली दफा आया था. विश्व आदिवासी दिवस के बहाने आज उनके अधिकारों की रक्षा की बात की गई है. उक्त बातें मुकेश बिरूवा ने कही.

विश्व आदिवासी दिवस आयोजन समिति के मुख्य संयोजक मुकेश और इपिल बने सचिव

मुकेश बिरूवा

प्राकृतिक तौर तरीकों को हु-ब-हू बचाये जाने की जरूरत

उन्होंने कहा कि आज पूरे विश्व में लगभग 200 आदिवासी समूह ऐसे हैं, जो अपनी सहूलियत के हिसाब से अलग रहते हैं. वैसे समूह बोलीविया, ब्राजील, कोलंबिया, इक्वाडोर, भारत, इंडोनेशिया, पापुआ न्यू गिनी, पेरू और वेनेजुएला में प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध दूरदराज के जंगलों में रहते हैं. वे बाकी दुनिया से अलग रहना पसंद करते हैं और उनकी गतिशीलता पैटर्न या जीवन जीने की शैली में कन्द-मूल, फल-फूल इकट्ठा और शिकार करने में संलग्न होने की उन्हें अनुमति देता है. जिससे उनकी संस्कृतियों और भाषाओं का संरक्षण अनवरत होता रहा है. उनकी भाषा प्रकृति से सीखी होती है. जैसे कोई पक्षी या किसी जंगली जानवर की आवाज को निकाल कर उसे आकर्षित करना हो ताकि पास आये तो शिकार कर सकें या पेड़ के पत्तों के पानी का जमीन पर गिरने से आने वाली आवाज हो, हवा का तेज बहना हो आदि से मानव की भाषा बोली के रूप में शुरू होती है. कालांतर में जब वह बोली स्थिर रूप में आ जाती है, तब हम उन बोलियों को भाषा के रूप में पहचानना शुरू करते हैं. इन आदिवासियों की भाषा शुद्ध रूप से प्राकृत होती है, लेकिन आज बाजारू भाषाओं के अतिक्रमण से उनकी भाषा की प्राकृतिक संबद्धता को काफी नुकसान हुआ है. उसी तरह जंगल के आदिवासियों की संस्कृति पूर्ण रूपेन प्रकृति पर आश्रित है. उनके यहाँ धर्म का आडंबर नहीं पहुँचा है. तो उनके रहन सहन के प्राकृतिक तौर तरीकों को हु-ब-हू बचाये जाने की जरूरत है. ताकि प्रकृति को समझने वाले इन लोगों के मार्फ़त हम प्राकृतिक समझ को बचाये रख सकें. इसके लिए उनके पूरे इलाक़े (territory) को उनके लिये छोड़ देना होगा और कई देशों ने यह कदम उठाया भी है. लेकिन विकास करने के नाम पर कई देशों में उन आदिवासियों को भौतिक दुनिया के रहन रहन के तरीकों में ढालने का प्रयास भी तेज हुआ है, उसे रोकने की जरूरत हैं.

आदिम आदिवासी आज उस प्राकृतिक वातावरण में जी रहे, उन्हें संपूर्ण संरक्षण की है जरूरत

हमने अपने इलाकों में भी देखा है, की जब सरकार उन आदिम जनजातियों के लिए पक्का घर बना कर देती है. तो कुछ ही दिन में वे उसे छोड़ कर जंगल में अस्थाई प्राकृतिक घरों में लौट जाते हैं. उसके कई कारण हैं, जैसे वे जिस लकड़ी से अपने लिए झोपड़ी बनाते हैं. उस घर में उन्हें कई तरह के बीमारी और मच्छड़ आदि परेशान नहीं करते हैं. क्योंकि जिन पेड़ और घासों का इस्तेमाल वे करते हैं, वह कई तरह के कीड़े मकोड़ियों को दूर रखने का काम भी करते हैं. ये अलग बात है कि आज जंगल में पेड़ों के कटने से वैसा जोगाड़ कर पाने में वे असहज हो रहे हैं. जो भी आदिम आदिवासी आज उस प्राकृतिक वातावरण में जी रहे हैं, उन्हें संपूर्ण संरक्षण की जरूरत है.

आदिवासियों के जंगलों का एक बड़ा हिस्सा हो रहा नष्ट

स्वायत्तता के अपने अधिकार के बावजूद, जैसा कि आदिवासी अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र घोषणा में निहित है. स्वैच्छिक अलगाव या अलग रहने की प्रवृत्ति और प्रारंभिक संपर्क से दूर रहने वाले आदिवासियों को आज कठिनाई भरे चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. उन आदिवासियों के क्षेत्रों में कृषि, खनन, पर्यटन और प्राकृतिक संसाधनों के विकास के परिणामस्वरूप आदिवासियों के जंगलों का एक बड़ा हिस्सा नष्ट हो रहा है. जिससे उनकी जीवन शैली बाधित हो रही है और प्राकृतिक पर्यावरण नष्ट हो रहा है जिसे उन्होंने पीढ़ियों से संरक्षित किया है. अभी हाल ही में निकोबार द्वीप समूह में विकास के लिए शॉम्पेन आदिवासियों के पारिस्थितिक तंत्र को तहस नहस करने की योजना बनाई गई है, जो चिंता की बात है.

आदिम जनजातियों को म्यूटेशन से होने वाली विनाशकारी बीमारियों से बचाना

आदिम आदिवासियों के लिए, बाहरी संपर्क से सबसे गंभीर खतरों में से एक बीमारियों का जोखिम है. बाहरी दुनिया से अलग रहने के कारण, उनके पास अपेक्षाकृत सामान्य बीमारियों के लिए प्रतिरक्षात्मक सुरक्षा नहीं है. आदिम जनजातियों को म्यूटेशन से होने वाली विनाशकारी बीमारियों से बचाना है. इसलिए उन्हें बाहरी दुनिया के संपर्क से जितना हो सके दूर ही रखना चाहिये.

आदिवासी जंगल के सबसे अच्छे हैं रक्षक

उन्होंने कहा कि प्रारंभिक संपर्क से मतलब मानव का प्रकृति के साथ प्रारंभिक संपर्क जिस समुदाय ने रखा है उससे हैं. यानी की मानव जीवन के उत्पत्ति के बाद इस प्रकृति से पहला संपर्क जिस समुदाय ने रखा तो उन्हें उतनी अहमियत और मान सम्मान देना इस दुनिया का काम होना चाहिए. तो स्वैच्छिक अलगाव और प्रारंभिक संपर्क में रहने वाले आदिवासी जंगल के सबसे अच्छे रक्षक हैं. जहाँ भूमि और क्षेत्रों पर उनके सामूहिक अधिकारों की रक्षा की जाती है. वहाँ जंगल उनके समाजों के साथ-साथ पनपते हैं. न केवल उनका अस्तित्व हमारे ग्रह की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है. बल्कि यह सांस्कृतिक और भाषाई विविधता की सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण है. आज की hyper-connected दुनिया में, स्वैच्छिक अलगाव और प्रारंभिक संपर्क में आदिवासियों का अस्तित्व मानवता की समृद्ध और जटिल ताने-बाने का प्रमाण है, और यदि उनका अस्तित्व समाप्त हो जाता है तो यह हमारी दुनिया के लिए भी यह बहुत बड़ी क्षति होगी.

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