चाईबासा धर्मांतरण मामला पश्चिमी सिंहभूम जिले के कुमारडुंगी थाना क्षेत्र अंतर्गत हल्दी पोखर गांव से सामने आया है, जहां ईसाई धर्म अपनाने वाले चार परिवारों के सामाजिक बहिष्कार का आरोप लगाया गया है। इस मामले में कुल 18 लोग कुमारडुंगी थाना पहुंचे और प्रशासन के समक्ष मौखिक शिकायत दर्ज कराई।
धर्मांतरित परिवारों का आरोप है कि उन्हें गांव में पेयजल, स्नान के लिए तालाब, दुकान से खरीदारी, तथा जंगल से लकड़ी, दातून और पत्ते लाने से रोका जा रहा है। उनका कहना है कि सामाजिक बहिष्कार के कारण दैनिक जीवन की बुनियादी जरूरतें पूरी करना कठिन हो गया है।
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चाईबासा धर्मांतरण मामले में प्रशासन की पहल
मामले की गंभीरता को देखते हुए कुमारडुंगी पुलिस प्रशासन ने दोनों पक्षों को थाना परिसर बुलाकर आपसी संवाद के माध्यम से समाधान निकालने का प्रयास किया। इस दौरान बड़ी संख्या में सारना धर्म को मानने वाले ग्रामीण भी थाना परिसर में उपस्थित हुए।
ग्रामीणों ने स्पष्ट रूप से कहा कि गांव में परंपरागत धार्मिक और सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए कुछ नियम तय किए गए हैं। उनके अनुसार, जो व्यक्ति सारना धर्म छोड़कर अन्य धर्म अपनाते हैं, उन्हें गांव के सामूहिक उपयोग वाले स्थलों जैसे तालाब, कुआं, चापाकल, दुकान और जंगल से जुड़े संसाधनों के उपयोग की अनुमति नहीं दी जाएगी।
ग्रामीणों का पक्ष: परंपरा और आस्था का संरक्षण
ग्रामीणों ने बताया कि लगभग आठ वर्ष पूर्व गांव के एक व्यक्ति ने सबसे पहले ईसाई धर्म अपनाया था, जिसके बाद धीरे-धीरे धर्मांतरित लोगों की संख्या बढ़कर 18 तक पहुंच गई। ग्रामीणों का मानना है कि यदि इस पर रोक नहीं लगाई गई, तो भविष्य में और लोग धर्म परिवर्तन कर सकते हैं, जिससे उनकी पारंपरिक धार्मिक आस्था, संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था प्रभावित होगी।
ग्रामीणों का यह भी कहना है कि गांव चारों ओर से घने जंगल से घिरा हुआ है और वर्षों से सुरक्षित रहा है। इसके पीछे वे अपनी वन देवी के प्रति आस्था, सांस्कृतिक परंपराओं और वर्ष 2006 से गठित वन समिति द्वारा किए जा रहे संरक्षण कार्यों को कारण मानते हैं। उनका तर्क है कि इन परंपराओं के उल्लंघन से गांव में अनहोनी घटनाएं घट सकती हैं।
चाईबासा धर्मांतरण मामला और संवैधानिक प्रावधान
मामले में अंचलाधिकारी मुक्ता सोरेंग ने ग्रामीणों को संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16 और 17 की जानकारी दी। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि भारत का संविधान किसी भी व्यक्ति के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव की अनुमति नहीं देता। सार्वजनिक उपयोग के संसाधनों से किसी को वंचित करना कानूनन गलत है।
उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि पानी या जंगल जैसे संसाधनों से वंचित किए जाने के कारण किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो इसकी जिम्मेदारी संबंधित ग्रामीणों पर तय की जा सकती है। इसलिए किसी भी नागरिक को बुनियादी सुविधाओं से वंचित नहीं किया जा सकता।
संवाद के बावजूद बनी रही असहमति
अंचलाधिकारी की बातों के बाद भी ग्रामीण अपने निर्णय पर अड़े रहे। उनका कहना था कि जिन स्थानों पर गांव के दियुरी या ग्रामीण धार्मिक और सामूहिक गतिविधियां करते हैं, वहां धर्मांतरित लोगों की उपस्थिति से उनकी धार्मिक मान्यताएं और सांस्कृतिक परंपराएं प्रभावित होंगी।
ग्रामीणों ने धर्मांतरित परिवारों से पुनः सारना धर्म में लौटने का आग्रह भी किया, ताकि गांव में सामाजिक समरसता बनी रह सके। हालांकि, धर्मांतरित परिवारों ने धर्म परिवर्तन वापस लेने से स्पष्ट इनकार कर दिया।
प्रशासनिक निर्णय और वर्तमान स्थिति
दोनों पक्षों की बातों को सुनने के बाद पुलिस प्रशासन, ग्रामीण मुंडा और अंचलाधिकारी की संयुक्त सहमति से यह निर्णय लिया गया कि धर्मांतरित परिवार गांव के सामूहिक उपयोग वाले स्थलों पर नहीं जाएंगे। पेयजल के लिए उन्हें गांव के सामने स्थित चुआ (प्राकृतिक जलस्रोत) के पानी का उपयोग करने की अनुमति दी गई है।
फिलहाल, चाईबासा धर्मांतरण मामला प्रशासन की निगरानी में है और स्थिति पर नजर रखी जा रही है। यह मामला एक बार फिर धार्मिक स्वतंत्रता, सामाजिक परंपरा और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन की जटिलता को उजागर करता है।







