Chaibasa (चाईबासा) : पश्चिम सिंहभूम के सदर अस्पताल में एक पिता द्वारा अपने 4 महीने के बच्चे के शव को झोले (थैले) में लेकर जाने की तस्वीर ने सबको झकझोर कर रख दिया है। इस गंभीर विषय पर चाईबासा की सिविल सर्जन डॉ. भारती मिंज ने अस्पताल का पक्ष रखते हुए घटनाक्रम की पूरी जानकारी साझा की है।
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4 महीने के मासूम की हालत थी बेहद नाजुक
सिविल सर्जन डॉ. भारती मिंज ने बताया कि 18 तारीख की शाम को कृष्णा चटुम्बा (उम्र 4 माह) को बेहद गंभीर स्थिति में अस्पताल लाया गया था। बच्चे को पिछले सात दिनों से तेज बुखार और लूज मोशन की शिकायत थी। अस्पताल पहुंचने पर डॉ. संदीप बोधरा ने तत्काल इलाज शुरू किया, लेकिन बच्चे का वजन मात्र 3 किलो 600 ग्राम था और उसे सांस लेने में अत्यधिक तकलीफ हो रही थी।
रेफर करने के बावजूद परिजनों ने जताई असमर्थता
डॉक्टरों ने बच्चे की स्थिति को देखते हुए उसे बेहतर इलाज के लिए जमशेदपुर के एमजीएम (MGM) अस्पताल रेफर करने का सुझाव दिया था। हालांकि, बच्चे के पिता ने अपनी आर्थिक तंगी का हवाला देते हुए बाहर जाने से मना कर दिया और सदर अस्पताल में ही इलाज जारी रखने का अनुरोध किया। डॉक्टरों की पूरी कोशिश के बावजूद, अगले दिन दोपहर 1:15 बजे बच्चे की मृत्यु हो गई।
शव वाहन आने में होना था 2 घंटे का विलंब
एम्बुलेंस या शव वाहन न मिलने के सवाल पर डॉ. मिंज ने स्पष्ट किया कि अस्पताल ने तुरंत ‘बिरसा युवा सेवा समिति’ के शव वाहन से संपर्क किया था। लेकिन उस समय वह वाहन मनोहरपुर में था और उसे चाईबासा वापस आने में लगभग 2 घंटे का समय लगने वाला था। अस्पताल प्रशासन ने पिता को इंतजार करने के लिए कहा था।
बिना सूचना दिए अस्पताल से निकल गए परिजन
सिविल सर्जन के अनुसार, बच्चे के पिता बहुत व्याकुल थे और शाम होने से पहले अपने गांव पहुंचना चाहते थे। उन्होंने शव वाहन का इंतजार नहीं किया और बिना वार्ड की नर्स या किसी अधिकारी को सूचना दिए, बच्चे के शव को झोले में रखकर वहां से निकल गए। इसी कारण अस्पताल प्रबंधन को उन्हें रोकने या मदद करने का मौका नहीं मिल सका।
अस्पताल कर्मियों और अन्य लोगों ने की थी मदद
डॉ. मिंज ने यह भी जानकारी दी कि बच्चे के पिता के पास फोन और पैसे की कमी थी। स्थिति को देखते हुए अस्पताल की नर्सों और वहां मौजूद अन्य मरीजों के परिजनों ने चंदा इकट्ठा कर उनकी आर्थिक सहायता भी की थी। सरकारी नियमों के तहत बीपीएल श्रेणी के लोगों के लिए तेल (फ्यूल) का खर्च अस्पताल देता है, लेकिन इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए परिजनों ने समय नहीं दिया।
निष्कर्ष :
यह घटना सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं और जमीनी हकीकत के बीच की खाई को दर्शाती है। जहां अस्पताल प्रशासन नियमों और उपलब्ध संसाधनों की दुहाई दे रहा है, वहीं एक मजबूर पिता की तस्वीर व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े करती है।
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