[wpdiscuz-feedback id=”js3su8kvd7″ question=”Please leave a feedback on this” opened=”1″]कैबिनेट की मंजूरी के बाद भी झारखंड में पेसा कानून अधिसूचित और सार्वजनिक नहीं होने से असमंजस बढ़ा। पंचायत प्रतिनिधि और विपक्ष सरकार से जवाब मांग रहे हैं।[/wpdiscuz-feedback]
रांची : झारखंड में पेसा कानून को राज्य कैबिनेट से स्वीकृति मिलने के बावजूद इसकी अधिसूचना और सार्वजनिक उपलब्धता अब तक नहीं हो पाई है। यही कारण है कि यह कानून फिलहाल आम जनता, जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक दलों के लिए एक पहेली बना हुआ है। त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था से जुड़े निर्वाचित प्रतिनिधियों के साथ-साथ विभिन्न राजनीतिक मंचों से यह सवाल उठने लगे हैं कि आखिर पेसा नियमावली में कौन-से प्रावधान शामिल किए गए हैं।
पेसा कानून को राज्य कैबिनेट से मिली मंजूरी, झामुमो ने मनाया ऐतिहासिक फैसला

पंचायती राज व्यवस्था की पृष्ठभूमि
राज्य गठन के बाद झारखंड विधानसभा ने वर्ष 2001 में पंचायती राज अधिनियम पारित किया था, जिसका उद्देश्य अनुसूचित और गैर-अनुसूचित दोनों क्षेत्रों में स्थानीय स्वशासन को सशक्त बनाना था। हालांकि, यह व्यवस्था आज तक पूरी तरह धरातल पर लागू नहीं हो सकी। पेसा कानून को प्रभावी बनाने की मांग को लेकर समय-समय पर जनआंदोलन और न्यायिक हस्तक्षेप भी सामने आते रहे हैं।
ड्राफ्ट से कैबिनेट तक की प्रक्रिया
राज्य सरकार ने वर्ष 2023 में पेसा नियमावली का मसौदा तैयार कर सार्वजनिक सुझाव आमंत्रित किए थे। पंचायती राज विभाग को इस पर बड़ी संख्या में सुझाव प्राप्त हुए, जिन पर विस्तृत विचार-विमर्श किया गया। इस बीच उच्च न्यायालय की सख्त टिप्पणियों के बाद आखिरकार 23 दिसंबर को कैबिनेट बैठक में नियमावली को मंजूरी दी गई। इसके बावजूद नियमों को न तो अधिसूचित किया गया और न ही आधिकारिक रूप से सार्वजनिक किया गया है।
परंपरागत व्यवस्था बनाम निर्वाचित पंचायत
कैबिनेट की स्वीकृति के बाद सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हुआ है कि पेसा नियमावली में आदिवासी समाज की पारंपरिक, धार्मिक और सामाजिक संरचनाओं को किस हद तक मान्यता दी गई है। यदि परंपरागत व्यवस्था को प्रमुखता दी जाती है, तो त्रिस्तरीय पंचायती राज के तहत चुने गए प्रतिनिधियों की भूमिका क्या होगी—इसको लेकर पंचायत प्रतिनिधियों में चिंता देखी जा रही है।
मुखिया संघ की आपत्ति
झारखंड प्रदेश मुखिया संघ के अध्यक्ष सोमा उरांव का कहना है कि नियमावली को सार्वजनिक न किए जाने से संदेह की स्थिति बन रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पेसा कानून का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब उसमें जनजातीय समाज की धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं को स्थान मिले और ग्राम सभाओं को वास्तविक स्वशासन का अधिकार सुनिश्चित किया जाए।
अन्य राज्यों की स्थिति
पेसा कानून पांचवीं अनुसूची के तहत अनुसूचित जनजाति बहुल क्षेत्रों में लागू होता है। देश के कई राज्यों—जैसे आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान और तेलंगाना—ने इसे अपने-अपने पंचायती राज कानूनों के तहत अधिसूचित कर लागू कर दिया है। झारखंड और ओडिशा में अब भी इसके पूर्ण क्रियान्वयन का इंतजार है।
विपक्ष का सरकार पर दबाव
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने पेसा नियमावली को सार्वजनिक करने की मांग तेज कर दी है। उनका कहना है कि जिस कानून का सीधा संबंध आदिवासी समाज की परंपराओं और स्वशासन से है, उसी समाज को इसके प्रावधानों की जानकारी नहीं मिल पा रही है। उन्होंने राज्य सरकार से नियमावली को जल्द सार्वजनिक करने की मांग की, ताकि किसी तरह का भ्रम न फैले।
2001 से अधूरी पंचायती व्यवस्था
उल्लेखनीय है कि राज्य गठन के बाद 2001 में झारखंड पंचायती राज अधिनियम पारित किया गया था, लेकिन आज तक इसे पूरी तरह लागू नहीं किया जा सका। पेसा कानून लागू होने से अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा को प्राकृतिक संसाधनों, विकास योजनाओं और स्थानीय प्रशासन में निर्णायक भूमिका मिलने की उम्मीद थी।


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