मंगला बाजार चाईबासा: कचरे के ढेर में आदिवासी किसानों की आजीविका, अफसरशाही बेनकाब

Chaibasa (चाईबासा) : चाईबासा नगर परिषद क्षेत्र में हर मंगलवार लगने वाला मंगला बाजार सिर्फ एक साप्ताहिक हाट नहीं, बल्कि पश्चिमी सिंहभूम के सैकड़ों गरीब आदिवासी किसानों और वनोपज विक्रेताओं की जीवनरेखा है। दूर-दराज़ के गांवों से लोग जंगल की उपज, घर में बने खाद्य पदार्थ और छोटे-मोटे सामान लेकर यहां पहुंचते हैं, ताकि सप्ताह भर के लिए अपने परिवार का पेट भर सकें।
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लेकिन मंगला बाजार की मौजूदा तस्वीर किसी सरकारी विज्ञापन की चमकदार स्क्रिप्ट नहीं, बल्कि व्यवस्था की वह नंगी सच्चाई है, जिसे अक्सर फाइलों और मंचों के पीछे छिपा दिया जाता है।
जहां एक ओर मंचों से यह दावा किया जाता है कि “झारखंड में आदिवासियों की सरकार है”, वहीं ज़मीन पर आदिवासी किसान कचरे के ढेर, सड़े-गले अवशेष, प्लास्टिक और बदबू के बीच बैठकर अपनी आजीविका बेचने को मजबूर हैं। यह बाजार कम और कूड़ा डंपिंग यार्ड ज़्यादा प्रतीत होता है।
मंगला बाजार में बैठी आदिवासी महिला
मंगला बाजार में बैठी आदिवासी महिला

तस्वीरें साफ़ गवाही देती हैं—

खुले कचरे के पहाड़, जैविक और प्लास्टिक कचरे का अंबार और उन्हीं के बीच बैठा गरीब आदिवासी विक्रेता।
न कोई पक्का प्लेटफॉर्म, न नियमित सफाई, न शौचालय, न पेयजल की व्यवस्था।
मानो सिस्टम ने पहले ही मान लिया हो कि “गरीब आदिवासी हैं, तो गंदगी में भी गुज़ारा कर ही लेंगे।”
यह स्थिति केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि आदिवासी सम्मान के साथ खुला मज़ाक है।

विडंबना देखिए —

इसी शहर में विकास योजनाओं के बोर्ड चमकते हैं,
ठेकेदारों की फाइलें तेज़ी से दौड़ती हैं,
और अफसरों की गाड़ियाँ समय से पहले और देर तक “मैदान में सक्रिय” दिखती हैं।
मंगला बाजार की बदहाली बताती है कि अधिकारी और ठेकेदार का तालमेल स्वच्छता पर नहीं, बल्कि समझौतों पर टिका है।
यदि सफाई होती, तो शायद कमीशन सूख जाता — और शायद इसी डर से कचरे को ही स्थायी व्यवस्था बना दिया गया है।
सवाल बेहद साधारण हैं, लेकिन जवाब व्यवस्था के पास नहीं— क्या गरीब आदिवासी किसान नागरिक नहीं हैं?
क्या उनके श्रम और स्वाभिमान की कोई कीमत नहीं?
क्या मंगला बाजार केवल टैक्स और वसूली का केंद्र है, सुविधा का नहीं?
यदि यही तस्वीर “विकास” की पहचान है, तो फिर विकास किसका हुआ— शहर का या अफसरों का ?
और अगर यही “आदिवासी सरकार” की ज़मीनी सच्चाई है, तो मंचों से बोली जाने वाली संवेदनाओं को इसी कूड़े के ढेर में दफन कर देना ही बेहतर होगा।
क्योंकि यहां गंदगी केवल जमीन पर नहीं — व्यवस्था की सोच में जमी है।
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