Chaibasa (चाईबासा)। पश्चिम सिंहभूम जिले में खनन प्रभावित क्षेत्रों के उत्थान के लिए निर्धारित जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट (DMFT) की कार्यप्रणाली अब विवादों के घेरे में है। भारत आदिवासी पार्टी के जिलाध्यक्ष सुशील बारला ने फंड के आवंटन और खर्च में गंभीर अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए केंद्रीय खनन मंत्रालय से हस्तक्षेप की अपील की है।
इस संबंध में 25 फरवरी 2026 को केंद्रीय खान सचिव को एक विस्तृत पत्र भेजा गया है, जिसमें सेवानिवृत्त न्यायाधीश की निगरानी में निष्पक्ष जांच की मांग की गई है।
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प्रमुख आरोप: विकास फाइलों में, जनता प्यासी
सुशील बारला ने अपने पत्र में उल्लेख किया है कि वर्ष 2015 से अगस्त 2025 तक जिले में करीब ₹3344 करोड़ की राशि DMFT मद में जमा हुई है। नियमों के अनुसार, इस राशि का बड़ा हिस्सा पेयजल, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे ‘उच्च प्राथमिकता’ वाले क्षेत्रों में खर्च होना था, लेकिन धरातल पर स्थिति इसके विपरीत है।
पेयजल संकट: करोड़ों के बजट के बावजूद, कई खनन प्रभावित गांवों के ग्रामीण आज भी दूषित नदी-नालों का पानी पीने को विवश हैं।
शिक्षा व स्वास्थ्य: सारंडा और कोल्हान जैसे समृद्ध खनिज क्षेत्रों के स्कूलों में शिक्षकों का अभाव है, वहीं स्वास्थ्य केंद्र चिकित्सकों और एंबुलेंस जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं।
रोजगार की अनदेखी: स्थानीय युवाओं को कौशल विकास और रोजगार से जोड़ने के दावों को भी उन्होंने खोखला बताया है।
आंकड़ों का गणित: 3000 योजनाएं अधूरी
शिकायत पत्र में वित्तीय वर्ष 2024-25 के आंकड़ों का हवाला देते हुए प्रशासनिक विफलता पर प्रहार किया गया है:
स्वीकृत योजनाएं: 8755
अपूर्ण कार्य: लगभग 3000 योजनाएं अब भी अधूरी पड़ी हैं।
पक्षपात का आरोप: आरोप है कि DMFT की नियमावली को ताक पर रखकर, जनहित के बजाय चहेते संवेदकों (Contractors) को लाभ पहुंचाने के लिए योजनाओं का चयन किया गया।
”सारंडा और नोवामुंडी की खदानें देश को राजस्व दे रही हैं, लेकिन वहां का आदिवासी समाज आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है। यह सीधे तौर पर उनके अधिकारों का हनन है।” — सुशील बारला, जिलाध्यक्ष, भारत आदिवासी पार्टी
इन विभागों को भेजी गई प्रतिलिपि
मामले की गंभीरता को देखते हुए इस शिकायत की प्रतियां झारखंड के मुख्य सचिव, ग्रामीण विकास मंत्रालय और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को भी प्रेषित की गई हैं। मांग की गई है कि न केवल फंड के ऑडिट की जांच हो, बल्कि दोषी अधिकारियों और बिचौलियों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।








