चाईबासा: महिला कॉलेज, चाईबासा के इतिहास विभाग में आज आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ (IQAC) के तत्वावधान में देश की प्रथम महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले एवं झारखंड निर्माण के प्रणेता जयपाल सिंह मुंडा के कर्मचिह्नों को स्मरण करते हुए एक प्रेरणादायी कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
इस अवसर पर कॉलेज की प्राचार्या डॉ. प्रीति बाला सिन्हा ने नववर्ष की शुभकामनाएँ एवं आशीर्वचन प्रदान करते हुए छात्राओं और शिक्षकों को शिक्षा, मूल्य और सामाजिक जिम्मेदारी के मार्ग पर अग्रसर रहने का संदेश दिया।
कार्यक्रम में आईक्यूएसी समन्वयक एवं इतिहास विभागाध्यक्षा डॉ. अमृता जायसवाल ने अपने व्याख्यान में कहा कि सावित्रीबाई फुले ने शिक्षा, सामाजिक न्याय और समानता के माध्यम से महिलाओं को सशक्त बनाने का जो मार्ग प्रशस्त किया, वह आज भी प्रेरणास्रोत है। वे सच्चे अर्थों में महिला सशक्तिकरण की अग्रदूत थीं। साथ ही उन्होंने कहा कि जयपाल सिंह मुंडा केवल एक खिलाड़ी या राजनेता नहीं थे, बल्कि वे आदिवासी अस्मिता, स्वाभिमान और अधिकारों के जीवंत प्रतीक थे।
कार्यक्रम का मंच संचालन डॉ. अंजना सिंह ने किया। उन्होंने सावित्रीबाई फुले के जीवन संघर्षों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि किस प्रकार उन्होंने सामाजिक विरोध और कठिनाइयों के बावजूद अपने जीवनकाल में 18 विद्यालयों की स्थापना की। शिक्षा के प्रचार-प्रसार के दौरान उन पर अपमानजनक व्यवहार और गंदगी फेंकी जाती थी, फिर भी उनका मनोबल कभी नहीं टूटा और वे जीवनपर्यंत महिलाओं के उत्थान के लिए समर्पित रहीं।
वहीं डॉ. ललिता सुंडी ने झारखंड के प्रणेता जयपाल सिंह मुंडा के जीवन और योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि जयपाल सिंह मुंडा, जिन्हें “मारंग गोमके” के नाम से जाना जाता है, का जन्म 3 जनवरी 1903 एवं निधन 20 मार्च 1970 को हुआ। वे झारखंड आंदोलन के प्रमुख नेता होने के साथ-साथ एक कुशल राजनीतिज्ञ, पत्रकार, लेखक, संपादक और शिक्षाविद थे। इसके अतिरिक्त वे 1925 में ऑक्सफोर्ड ब्लू का खिताब प्राप्त करने वाले हॉकी के एकमात्र अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी थे। उनकी कप्तानी में भारत ने 1928 के ओलंपिक खेलों में पहला स्वर्ण पदक हासिल किया था।
इस कार्यक्रम में स्नातक एवं परास्नातक के सभी सेमेस्टर की छात्राएँ उपस्थित रहीं। कार्यक्रम का धन्यवाद ज्ञापन पीजी सेमेस्टर-2 की छात्रा संजना गोप द्वारा किया गया।
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