सरायकेला: झारखंड की सांस्कृतिक राजधानी सरायकेला के विश्वविख्यात छऊ नृत्य का आकर्षण अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को लांघ चुका है। हाल ही में फ्रांस की 75 वर्षीय कला प्रेमी गिसले बुसन सरायकेला पहुंचीं, जहां उन्होंने यहां की अलौकिक जनजातीय संस्कृति और छऊ नृत्य की बारीकियों का अवलोकन किया।
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गिसले ने न केवल इस नृत्य के सौंदर्य को सराहा, बल्कि पारंपरिक मुखौटों में छिपी भावनात्मक गहराई को देखकर आश्चर्यचकित रह गईं। अपनी यात्रा के दौरान, गिसले ने छऊ कला केंद्र के पूर्व निदेशक तपन कुमार पटनायक से मुलाकात कर नृत्य की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, प्रशिक्षण पद्धति और मुखौटा निर्माण की जटिल कला को समझा। इसके बाद वे ईचा गांव पहुंचीं, जहां स्थानीय कलाकारों की जीवंत प्रस्तुति ने उन्हें भावविभोर कर दिया। उन्होंने कहा कि छऊ केवल एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक “जीवंत संस्कृति” है जो कलाकारों के समर्पण से आज भी सुरक्षित है।
दिलचस्प बात यह है कि 75 वर्ष की उम्र में भी गिसले का भारत के प्रति लगाव कम नहीं हुआ है। वे अब तक 11 बार भारत का भ्रमण कर चुकी हैं, जिसमें से दो बार वे विशेष रूप से झारखंड आई हैं। उन्होंने बताया कि झारखंड का इतिहास, सादगी, पारंपरिक खान-पान और यहां का ट्राइबल कल्चर उन्हें बार-बार अपनी ओर खींचता है। गिसले बुसन का यह दौरा सिद्ध करता है कि सरायकेला की कला आज भी वैश्विक पटल पर एक अमिट छाप छोड़ रही है और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणास्रोत बनी हुई है।



