Jharkhand Municipal Corporation News: नगर निगम चुनाव: मेयर पद के आरक्षण पर हाईकोर्ट सख्त, सरकार ने दाखिल नहीं किया जवाब

​Ranchi (रांची) : झारखंड के नगर निगमों को दो श्रेणियों (ग्रुप-A और ग्रुप-B) में बांटने के राज्य सरकार के फैसले के खिलाफ झारखंड हाईकोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। चीफ जस्टिस तरलोक सिंह चौहान और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा अब तक जवाब दाखिल नहीं किए जाने पर गहरी नाराजगी व्यक्त की।

अदालत ने सरकार को अंतिम अवसर देते हुए 7 जनवरी तक जवाब दाखिल करने का सख्त निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई भी इसी तिथि को मुकर्रर की गई है।

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मेयर पद के लिए आरक्षण
मेयर पद के लिए आरक्षण

​क्या है पूरा विवाद?

नगर विकास विभाग ने 16 अक्टूबर को एक अधिसूचना जारी कर राज्य के 9 नगर निगमों को दो श्रेणियों में बांट दिया था। इस नए नियम के तहत रांची और धनबाद को एक ही समूह (वर्ग ‘क’) में रखा गया है। प्रार्थी शांतनु चंद्रा उर्फ बब्लू पासवान ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि यह विभाजन पूरी तरह से असंवैधानिक और मनमाना है।

​आरक्षण के ‘खेल’ का आरोप:

याचिकाकर्ता के अनुसार, सरकार ने कार्यपालिका आदेश के जरिए मेयर पदों का जो वर्गीकरण किया है, वह 2011 की जनगणना के आंकड़ों की अनदेखी करता है। नियमों के मुताबिक, सबसे अधिक जनसंख्या होने के कारण आदित्यपुर का मेयर पद जेनरल के लिए और सबसे अधिक एससी जनसंख्या होने के कारण धनबाद का पद एससी के लिए आरक्षित होना चाहिए था। लेकिन सरकार ने रांची और धनबाद को एक ही श्रेणी में डालकर ऐसा समीकरण बनाया है।

जिससे रांची की सीट एसटी के लिए आरक्षित हो जाए और धनबाद की सीट अनारक्षित रह जाए। इसके अलावा गिरिडीह में कम आबादी के बावजूद पद को एससी के लिए आरक्षित करने पर भी सवाल उठाए गए हैं। अदालत अब 7 जनवरी को तय करेगी कि सरकार का यह ‘फॉर्मूला’ संवैधानिक मापदंडों पर खरा उतरता है या नहीं।

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