चाईबासा। पत्नी के इलाज पर खर्च हुई बीमा राशि का भुगतान नहीं करने के मामले में जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, पश्चिमी सिंहभूम ने SBI General Insurance के खिलाफ अहम फैसला सुनाया है। आयोग ने बीमा कंपनी को शिकायतकर्ता महेंद्र रजक को इलाज पर खर्च हुए 82,572 रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया है। इसके अलावा मानसिक पीड़ा एवं परेशानी के लिए 40,000 रुपये और वाद व्यय के रूप में 10,000 रुपये देने को कहा गया है।
इस तरह आयोग के आदेश के तहत शिकायतकर्ता को कुल 1,32,572 रुपये का भुगतान करना होगा। राशि का भुगतान आदेश की तिथि से 45 दिनों के भीतर करने का निर्देश दिया गया है। तय समय में भुगतान नहीं करने पर आदेश के अनुसार 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देय होगा।
पत्नी के इलाज के बाद उठे बीमा भुगतान का विवाद
मामला सी.सी. केस संख्या 28/2025 से संबंधित है। मामले की संस्थापन तिथि 16 जुलाई 2025, अंतिम सुनवाई 22 अगस्त 2026 और फैसला 2 सितंबर 2026 को घोषित किया गया।
शिकायतकर्ता महेंद्र रजक, मूल रूप से ब्रहमणी घाट, डाकघर बिष्णुपुर, जिला गया, बिहार के निवासी हैं और वर्तमान में पुलिस लाइन, चाईबासा में रह रहे हैं। उन्होंने अपने और परिवार के लिए SBI General Insurance की Arogya Plus स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी ली थी। संबंधित पॉलिसी की अवधि 13 फरवरी 2024 से 12 फरवरी 2025 तक थी।
इसी अवधि में उनकी पत्नी कलावती देवी को बीमारी के इलाज के लिए 16 अक्टूबर 2024 को गुरुनानक हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर में भर्ती कराया गया। वह 22 अक्टूबर 2024 तक अस्पताल में भर्ती रहीं। इलाज के दौरान कुल 82,572 रुपये खर्च हुए।
जरूरी दस्तावेज देने के बावजूद भुगतान नहीं होने का आरोप
शिकायतकर्ता के अनुसार इलाज से संबंधित मेडिकल दस्तावेज और खर्च के बिल बीमा कंपनी के समक्ष प्रस्तुत किए गए, लेकिन इसके बावजूद दावे की राशि का भुगतान नहीं किया गया। मामले की सुनवाई के दौरान Claim No. 90688291 का भी उल्लेख किया गया।
शिकायतकर्ता की ओर से 18 अक्टूबर 2024 को बीमा कंपनी द्वारा अस्पताल को भेजा गया पत्र भी आयोग के समक्ष रखा गया। इस पत्र में अस्पताल को कैशलेस सुविधा उपलब्ध कराने में असमर्थता जताई गई थी।
बीमा कंपनी ने क्या कहा?
मामले में बीमा कंपनी की ओर से दावा किया गया कि शिकायतकर्ता की तरफ से उसके समक्ष कोई विधिवत बीमा दावा दर्ज नहीं कराया गया था। कंपनी ने शिकायत को समय से पहले दायर किए जाने की दलील भी दी और कहा कि बीमा पॉलिसी के तहत निर्धारित क्लेम प्रक्रिया का पहले पालन किया जाना चाहिए था।
हालांकि, आयोग ने कंपनी की इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
आयोग ने रिकॉर्ड पेश नहीं करने पर उठाए सवाल
आयोग ने अपने फैसले में माना कि जब अस्पताल से कैशलेस सुविधा को लेकर बीमा कंपनी के स्तर पर पत्राचार हुआ था और मामले में दावा संख्या का भी उल्लेख सामने आया, तब केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि कंपनी के पास कोई दावा प्राप्त नहीं हुआ।
आयोग के अनुसार कंपनी अपने पास मौजूद क्लेम रिकॉर्ड, इलेक्ट्रॉनिक हिस्ट्री और अन्य संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत कर मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट कर सकती थी। लेकिन ऐसा नहीं किया गया।
आयोग ने माना कि शिकायतकर्ता की ओर से उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों के बावजूद बीमा कंपनी ने दावे का उचित तरीके से परीक्षण कर कोई स्पष्ट और कारणयुक्त निर्णय नहीं दिया। इसे उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत सेवा में कमी (Deficiency in Service) माना गया।
पूरा अस्पताल बिल स्वतः स्वीकार नहीं, लेकिन निष्पक्ष जांच जरूरी
आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि अस्पताल में खर्च हुई पूरी राशि को बिना जांच के स्वतः बीमा कंपनी द्वारा भुगतान किए जाने योग्य नहीं माना जा सकता। हालांकि, बीमा कंपनी की जिम्मेदारी थी कि दावा प्राप्त होने के बाद उसकी निष्पक्ष, पारदर्शी और उचित तरीके से जांच करे और अपने निर्णय के कारण स्पष्ट करे।
45 दिन में करना होगा भुगतान
आयोग ने सभी विपक्षी पक्षों को संयुक्त अथवा पृथक रूप से शिकायतकर्ता को 82,572 रुपये की दावा राशि, 40,000 रुपये मानसिक पीड़ा एवं परेशानी के लिए और 10,000 रुपये वाद व्यय के रूप में भुगतान करने का आदेश दिया है।
आदेश के मुताबिक पूरी राशि 45 दिनों के भीतर चुकानी होगी। निर्धारित समय में भुगतान नहीं होने की स्थिति में 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज लागू होगा।






