Jaintgarh (जैंतगढ़) : झारखंड में टेट (TET) की विसंगति का मामला एक बार फिर चर्चा में है। लगभग 2500 पारा शिक्षक पिछले डेढ़ वर्ष से अपने मामले के समाधान की उम्मीद लगाए बैठे हैं। पारा शिक्षक संघ का आरोप है कि समान प्रकार की टेट विसंगति के बावजूद कुछ शिक्षकों को स्थायी शिक्षक के पद पर नियुक्त कर वेतनमान दिया जा रहा है, जबकि दूसरे शिक्षकों को अब भी नॉन-टेट पारा शिक्षक का मानदेय देकर उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है।
पारा शिक्षक संघ के मुखर नेता शंकर गुप्ता ने सरकार की नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि झारखंड में एक ही मामले में अलग-अलग मापदंड अपनाए जा रहे हैं। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि अगर किसी को “एक आंख में काजल और दूसरी में सुरमा” का उदाहरण देखना हो तो झारखंड आना चाहिए।
उनका दावा है कि राज्य में करीब सात हजार ऐसे पारा शिक्षक रहे हैं, जिन्हें टेट की विसंगति के बावजूद अलग-अलग समय में सहायक शिक्षक अथवा सहायक आचार्य के पद पर नियुक्ति का लाभ मिला है। वर्ष 2014-15 में करीब छह हजार पारा शिक्षकों को सहायक शिक्षक के पद पर पदस्थापित कर स्थायी किया गया, जबकि वर्ष 2026 में करीब एक हजार विसंगति वाले पारा शिक्षकों को सहायक आचार्य के पद पर नियुक्त कर वेतनमान दिया जा रहा है।
इसके विपरीत, कुछ अंक अथवा विषयगत पात्रता की विसंगति के कारण बचे पारा शिक्षकों को अब भी टेट उत्तीर्ण नहीं माना जा रहा है। संघ का कहना है कि इन शिक्षकों को नॉन-टेट का मानदेय मिलने के कारण हर महीने करीब तीन से साढ़े चार हजार रुपये तक का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
डेढ़ साल से समाधान की प्रतीक्षा
संघ के अनुसार, लगभग 2500 पारा शिक्षक पिछले करीब डेढ़ वर्ष से इस समस्या के समाधान की प्रतीक्षा कर रहे हैं। शिक्षकों का कहना है कि मामले को लेकर संबंधित विभागों के स्तर पर कई बार पहल हुई, लेकिन अभी तक अंतिम समाधान नहीं निकल पाया है।
पारा शिक्षकों का आरोप है कि जब समान परिस्थिति वाले दूसरे शिक्षकों को स्थायी नियुक्ति का लाभ मिल सकता है, तो उनके मामले में टेट विसंगति को आधार बनाकर नॉन-टेट मानदेय देना उचित नहीं है।
मानव अधिकार कार्यकर्ता ने भी उठाए सवाल
मानव अधिकार कार्यकर्ता गुरबक्श सिंह अहलूवालिया ने भी मामले में सरकार के रुख पर सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि झारखंड शिक्षा परियोजना की 68वीं कार्यकारिणी की बैठक में विसंगति वाले पारा शिक्षकों के मामले को स्थगित रखने का निर्णय समझ से परे है।
उनका कहना है कि यदि विधि विभाग, महाधिवक्ता, उच्च न्यायालय और शिक्षा विभाग से जुड़े स्तरों पर मामले को लेकर सहमति अथवा सकारात्मक स्थिति बन चुकी है, तो केवल वित्तीय भार का हवाला देकर शिक्षकों को उनके अधिकार से वंचित रखना उचित नहीं होगा।
अहलूवालिया ने कहा कि कम मानदेय पर काम कर रहे पारा शिक्षकों के साथ यदि न्याय नहीं किया गया तो वे मानव अधिकार न्यायालय की शरण लेने के लिए बाध्य होंगे।
क्या है टेट विसंगति का मामला?
पारा शिक्षक संघ के अनुसार, विसंगति का मुख्य मामला शिक्षकों की नियुक्ति के स्तर और उनके द्वारा उत्तीर्ण किए गए टेट के स्तर के बीच अंतर से जुड़ा है।
एक श्रेणी में ऐसे पारा शिक्षक हैं, जिनकी नियुक्ति कक्षा एक से पांच के लिए हुई, लेकिन उन्होंने कक्षा छह से आठ के लिए निर्धारित टेट उत्तीर्ण किया है।
दूसरी ओर, कुछ ऐसे शिक्षक भी हैं जिनकी नियुक्ति कक्षा छह से आठ के लिए हुई, लेकिन उन्होंने कक्षा एक से पांच का टेट उत्तीर्ण किया है।
संघ का कहना है कि इसी अंतर को टेट विसंगति माना जा रहा है और ऐसे शिक्षकों को टेट उत्तीर्ण होने के बावजूद नॉन-टेट श्रेणी का मानदेय दिया जा रहा है।
हर महीने हजारों रुपये का नुकसान
विसंगति के कारण प्रभावित शिक्षकों को आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ रहा है। संघ के मुताबिक नॉन-टेट मानदेय दिए जाने से शिक्षकों को वर्तमान व्यवस्था में प्रति माह लगभग 3,000 से 4,500 रुपये तक कम राशि मिल रही है।
पारा शिक्षकों का कहना है कि वर्षों से शिक्षा व्यवस्था में सेवा देने के बावजूद उन्हें समान काम के बदले समान आर्थिक लाभ नहीं मिल रहा है। इससे शिक्षकों में नाराजगी बढ़ रही है।
संघ ने सरकार के सामने रखी दो टूक मांग
पारा शिक्षक संघ ने सरकार से विसंगति का स्थायी समाधान करने की मांग की है। संघ का कहना है कि प्रभावित शिक्षकों को उनका उचित मानदेय दिया जाए और पिछली अवधि का एरियर भी प्रदान किया जाए।
संघ ने यह भी कहा है कि यदि सरकार टेट विसंगति को नियुक्ति अथवा पदस्थापना में बाधा मानती है, तो समान विसंगति वाले उन शिक्षकों के मामलों पर भी एक समान नीति लागू होनी चाहिए, जिन्हें वर्ष 2014-15 और 2026 में सहायक शिक्षक एवं सहायक आचार्य के पद पर नियुक्ति का लाभ दिया गया है।
शंकर गुप्ता ने कहा कि पारा शिक्षक अब इस मामले को गंभीरता से उठा रहे हैं। उनका कहना है कि यदि सरकार ने समान परिस्थिति में अलग-अलग मापदंड अपनाना जारी रखा तो पारा शिक्षक “एक आंख में काजल और एक में सुरमा” को मुद्दा बनाकर अपने अधिकार की लड़ाई आगे बढ़ाएंगे और जरूरत पड़ने पर उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे।
फिलहाल करीब 2500 प्रभावित पारा शिक्षकों की निगाह सरकार के अगले निर्णय पर टिकी हुई है। शिक्षकों को उम्मीद है कि लंबे समय से लंबित इस मामले का जल्द समाधान निकलेगा और उन्हें उनके अनुसार मानदेय एवं अन्य आर्थिक लाभ मिल सकेंगे।








