क्षेत्रीय जनजातीय विषयों में पीएचडी करने से वंचित करना मतलब आदिवासियों का अधिकार एवं संस्कृति परंपरा को खत्म करना: सनातन पिंगुवा

Chaibasa :- बहुत ही लंबी संघर्ष करने के बाद ही, आदिवासी बहुल क्षेत्र में 13 अगस्त 2009 को कोल्हान विश्वविद्यालय की स्थापना हुआ. कोल्हान यूनिवर्सिटी पीजी छात्रसंघ अध्यक्ष सनातन पिगुवा ने कहा कि रांची विश्वविद्यालय से अलग विश्वविद्यालय के मांग इसीलिए किया गया था कि कोल्हान के क्षेत्रीय अनुसूचित जाति और जनजाति के विद्यार्थियों पर विशेष ध्यान देगी लेकिन इसका उल्टा हो रहे हैं. कोल्हान विश्वविद्यालय के अंतर्गत किसी भी महाविद्यालय में एक भी क्षेत्रीय भाषा स्थाई शिक्षक नहीं होना बड़ी दुर्भाग्य की बात है. स्नातकोत्तर अंतिम सेमेस्टर के कई सारे छात्रा पीएचडी करना जाते है और बहुत सारे ऐसे विद्यार्थी थे जो क्षेत्रीय भाषा में पीएचडी का नोटिफिकेशन का इंतजार कर रहे थे.

सनातन पिगुवा ने कहा कि स्नातकोत्तर में लगभग 1000 से अधिक विद्यार्थियों है इतनी सारी विद्यार्थियों को क्षेत्रीय भाषा शिक्षकों की वजह से पीएचडी से वंचित करना, मतलब विद्यार्थियों का गला दबाना जैसा है. मंत्री से लेकर विधायक तक सभी प्रतिनिधि विकास एवं आदिवासियों का अधिकार का बात करता है. लेकिन कोई भी जमीनी स्तर पर एजुकेशन को लेकर आवाज नहीं उठाते हैं.

उन्होंने कहा कि झारखंड सरकार क्षेत्रीय जनजाति विषयों के शिक्षकों बहाली करने का घोषणा किया कि था. विफल साबित हुई है. कोल्हान विश्वविद्यालय प्रशासन के पास JPSC क्वालीफाई टीचर रखने का अथॉरिटी है टीचर को रखने का और
और क्षेत्रीय जनजातीय भाषा पढ़ने के बाद अधिकतर विद्यार्थी बेरोजगार हैं. केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार की ओर से किसी तरह की बहाली नहीं हो रही है उसी की वजह से विद्यार्थियों में काफी आक्रोश देखने को मिल रहा है और जगह जगह पर आंदोलन के माध्यम से बेरोजगार युवा रोजगार का मांग रहा है. कोल्हान विश्वविद्यालय द्वारा क्षेत्रीय एवं जनजातीय भाषाओं में पीएचडी शोध कार्य से विद्यार्थियों को वंचित किया जाएगा तो कतई बर्दाश्त नहीं होगा. छात्र प्रतिनिधि द्वारा जोरदार तरीके से आंदोलन होगा. इसका जिम्मेदारी कोल्हान विश्वविद्यालय का होगा.

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