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Home - Jharkhand - “हो समाज” के लड़ाकुओं ने अंग्रेज़ी सेना को घुटने टेकने पर कर दिया था मजबूर, उसी स्थल पर मनाया जाएगा विजय दिवस, जानें
Jharkhand

“हो समाज” के लड़ाकुओं ने अंग्रेज़ी सेना को घुटने टेकने पर कर दिया था मजबूर, उसी स्थल पर मनाया जाएगा विजय दिवस, जानें

By The News24 Live18/11/2022No Comments8 Mins Read
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Chaibasa :- सेरेंग्सिया घाटी में 19 नवम्बर 1837 को पोटो हो के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई जीती गई थी. जिसे लेकर 19 नवंबर को विजय दिवस मनाया जाएगा. जिसमें पारम्परिक तीरन्दाज़ी उसी जगह पर आयोजित की जा रही है. जहां अंग्रेज़ी सेना को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया गया था. उसके अलावे और भी पारम्परिक आयोजन किए जा रहे हैं. उक्त बातें आदिवासी हो समाज महासभा पूर्व महासचिव मुकेश बिरुवा ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कही.

उन्होंने बताया कि सेरेंगसिया घाटी की लड़ाई के नायक पोटो हो, जैतगढ़ के नजदीक राजाबासा गांव के निवासी थे. उस समय, पश्चिम सिंहभूम का बलांडिया-जैंतगढ़ क्षेत्र बाहरी हस्तक्षेप के खिलाफ प्रतिरोध का पारंपरिक केंद्र था. जब नव स्थापित साउथ वेस्ट फ्रनटियर एजेन्सी द्वारा (1837) ब्रिटिशों का प्रभाव कोल्हान में फैल रहा था. तो पोटो हो ने इन अंग्रेजों की ग़ुलामी के विरुद्द उलगुलान छेड़ दिया था और लोगों के प्रतिरोध का नेता बन गया था.

पोटो हो ने अपने लोगों को समझाया कि वे पोड़ाहाट के राजा, साराइकेला के कुंवर और अंग्रेजों को, हो दिशुम से बाहर रखे.  हालांकि, उनका विशेष दुश्मन जैतगढ़ के रागुनाथ बिसी थे. जिन्होंने पास के ब्रिटिश सैनिकों से मित्रता की थी और ‘हो’ लोगों का शोषण किया था. 1830 में यहां चीजें सिर पर आईं जब उन्होंने ‘हो’ नेता सुबन को गिरफ्तार किया था और उसकी मौत मुक़दमे के लिए संबलपुर ले जाते समय रास्ते में ही हो गई. इससे भड़क कर करीब 1500 ” हो ” लोगों ने रागुनाथ बिसी पर आक्रमण कर दिया और रघुनाथ बीसी मरते मरते किसी तरह भाग निकला.

कोल्हान गवर्न्मेंट एस्टेट की स्थापना मार्च 1837 में ब्रिटिश सरकार द्वारा अल्पकालीन लेकिन एक क्रूर अभियान के बाद की गई थी. यह मुख्य रूप से इस उद्देश्य से किया गया था. ताकि राजा हो’ लोगों को अपनी सेना में ना रखे. इन ‘हो’ अनियमित सेनाओ का प्रयोग राजा आपसी परस्पर लड़ाई के लिए रखते थे. “हो” लोगों से लड़ाई में अंग्रेजों ने रघुनाथ बीसी का साथ दिया. जिस कारण बाद में रघुनाथ बिसी को लौटने की इजाजत दी गई. रघुनाथ बिसी के लौटने से हो’ लोग खुश नहीं थे, उनमें पोटो’ हो भी एक थे.

कोल्हान में ब्रिटिश लोगों की उपस्थिति  के बारे में अलग अलग राय थी. कुछ लोगों का मत था की ब्रिटिश का आना एक कड़ुवा अनुभव है. जबकि कुछ लोगों के अनुसार ब्रिटिश के आने से करों की दरों में कमी आई. साथ ही ब्रिटिश लोगों ने बाहरी लोगों को कोल्हान में आने से रोका. ‘हो’ लोगों का कोई परिषद नहीं था, जहाँ पर सभी ‘हो’ एकमत हो पाते. प्रत्येक अवसर के लिए अलग राजनीतिक और सैन्य गठबंधन किए जाते थे. पोटो हो लोगों का 20-25 पुरुषों का एक समूह था. जिसमें हाल ही में रांची जेल से रिहा किए गए पुरुषों को भी शामिल किया गया था. राँची जेल में रहने के दौरान इन पुरुषों के कई हो’ साथियों की मृत्यु हो गई थी. अपने दोस्तों की मौत का बदला लेने के लिए उन्होंने पोटो हो’ का समूह ज्वाइन कर लिया. पोटो हो का समूह उस समय एक उभरता हुआ समूह था.

पोटो हो का समूह गाँवों की ओर चला गया. जैतगढ़ के दक्षिण दिशा में जंगलो के मध्य स्थित एक छोटे से गाँव पोकम में उन्होंने एक वॉर कौंसिल का गठन किया. एक तीर को संकेत स्वरुप चारों दिशाओ में गांवो की ओर भेजा. ताकि गाँव वालों का सहमति लिया जा सके की युद्ध में पोटो के साथ हैं. अब तक कई गाँव वाले अनिश्चित की अवस्था में थे की वे पोटो का साथ दे या नहीं. लेकिन अब पोटो के साथ 22 गाँव शामिल हो गए.

622 में से महज, 22 गांव बहुत अधिक नहीं थे. लेकिन अन्य गाँवों से भी लोग व्यक्तिगत स्तर पर पोटो के साथ शामिल हुए.  हालांकि पोटो की परिषद ने अनिच्छुक गांवों को भाग लेने या कम से कम तटस्थ रहने के लिए धमकी दी थी. यह उन्होंने अधिक आसानी से किया. क्योंकि इनमें से कुछ गांवों ने पहले के अभियान में हो’ भगोड़ाओं को अंग्रेजों को सौप कर, अंग्रेजों की मदद की थी.

पोटो और उनकी परिषद एक औपचारिक संघ बनाना चाहता था. इसके लिए उन्हें क्योंझर के बड़बिल से एक मगुई नाइक नामक एक भूईयां से मिला. जिन्होंने विद्रोहियों को जीत के मंत्र दिए. एक भव्य पूजा के लिए एक दिन निश्चित किया गया. लेकिन उससे पहले ही करों का भुगतान न करने के लिए में मगुई को क्योंझर में गिरफ्तार कर लिया गया था.
हालांकि इसमें काफी लोग आये थे.

बलाण्डिया में बैठक में पोटो और उसके सहयोगियों ने सेरेंगसिया और बगाबिला घाटी पर कब्जा करने का फैसला किया. ये दोनों घाटियाँ हो दिशुम को उत्तर-दक्षिण में अलग करती थी. इन लोगों ने योजना बनाई की सभी साहबों (अंग्रेजों और उनकी सेना) को मारना था और सभी बाहरी लोगों को निष्कासित करना, स्पष्ट रूप से इन्होने सबसे पहले जैतगढ़ को टारगेट किया. उसके बाद उन गाँवों को निशाना बनाना था, जिन्होंने ब्रिटिश व्य्वस्था का समर्थन किया था.

17 नवम्बर को विल्किंसन (जो दक्षिण पश्चिमी फ्रंटियर एजेन्सी का राजनीतिक एजेंट था), कैप्टन आर्मस्ट्रांग को 400 पैदल सेना, 60 घुड़सवार और दो बंदूकें, साराइकेला से 200 सहायक और सहायक टिकेल को कुछ सैकड़े हो’ लोगों के साथ दक्षिण की ओर से पोटो हो’ के अभियान को नियंत्रित करने के लिए भेजा. सेरेंगसिया घाटी की लड़ाई 19 नवंबर 1837 को हुई थी. यह रास्ता जंगली पहाड़ियों के मध्य से एक व्यापक मार्ग के करीब एक रणनीतिक बिंदु पर था. इस इलाके में पेड़ों से भरे घने जंगल थे. टिकेल लिखते हैं – “सड़को के किनारे अनेक जंगल और घाटियाँ थी ”

एक संवाद वाहक जो लड़ाई के समय सैनिक टुकड़ियों के साथ था, इसने लड़ाई का आँखो देखा हाल वर्णन किया
है 
“कैप्टन आर्मस्ट्रांग और सहायक टिकेल की सेना सेरेंग्सिया घाटी में लगभग 25 मीटर ही घुशी थी की घाटी के दोनों छोर से तीरों की बछौर शुरू हो गई. लोगों की सियार की तरह कराहने की आवाज़ सुनाई देनी लगी. तीरों की बौझार से लोग तब तक घायल होते रहे, जब तक उनके घोड़े तीरों की मारक छमता से दूर ना चले गए. ‘हो’ लोगों ने लड़ाई के लिए बेहतर पोजिसन ले रखा था. इस लड़ाई में एक आदमी की मौत हो गई, और पांच या छह घायल हो गए और एक रिपोर्ट हमें पहुंची कि खड़बंद गांव में घावों के इलाज के दरमियान तीन अन्यों की भी मौत हो गई. घाटी पार करने के बाद हमने अपने हाथ ऊपर उठा लिए, हमने पाया की एक सूबेदार, एक हवलदार, तेरह सिपाही घायल पड़े थे, इनमें से दो गंभीर रूप से घायल थे. कुछ मीटर दूरी से एक कोल का तीर धनुष, बन्दुक की गोली की तरह काम कर रहा था”.

टिकेल ने उसी दिन एक लिखित संक्षिप्त विवरण विल्किंसन को भी भेजा –
“ हम पर काफी बड़ी संख्या पर तीर चलाया गया था. कोलों ने अपनी पोजीशन पेड़ो और पत्थरों के पीछे ले रखी थी. जब तक दो या तीन राउंड गोलियाँ यूँ ही नहीं चलाई जाती, उनकी पोजीशन को जान पाना असंभव था. मै यह जान नहीं पाया की वे कितने घायल हुए थे, एक ब्रिटिश रिपोर्ट के अनुसार चौदह, जबकि संवाद दाता के अनुसार तेरह  घायल थे. जिनमे से दो की हलात गंभीर थी ”

पोटो की फांसी
युद्ध के बाद पोटो और उसके साथियों के बारे में जो लगभग 2000 संख्या में थे, उनकी खोज चल रही थी. अंग्रेजों ने उत्तर दिशा में दलाल लोगों को स्काउट के रूप में लगाया. लेकिन ऐसा लगता है कि उनका सहयोग पूरी तरह दिल से नहीं था. एक मौके पर एक बड़ा हमला गलत हो गया. क्योंकि स्काउट ने सेना को गलत दिशा में ले गए थे. फिर भी 8 दिसंबर को, सेरेंगसिया में अपनी हार के तीन सप्ताह बाद, दलाल स्काउट्स ने जंगल में पोटो का पता लगाया और उसे आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर कर दिया, और उन्हें पकड़ लिया गया. विल्किन्सन 18 दिसंबर की शाम को जगन्नाथपुर में टिकेल के शिविर में पहुंचे. विल्किंसन के हाथी से गिरने के कारण, कोर्ट की सुनवाई  स्थागित हुई, पर मुकदमा 25 दिसंबर को शुरू हुआ और 31 दिसंबर को समाप्त हुआ. पांच नेताओं को मौत की सजा सुनाई गई थी और 79 हो’ लोगों को कारावास की विभिन्न सजा दी गई.

पोटो, नारा और बुड़ाई को दी गई फांसी-
अगले दिन 1 जनवरी 1838 को, पोटो, नारा और बुड़ाई को जगन्नाथपुर के पास सार्वजनिक रूप से फांसी दी गई. ‘हो’ लोगों की बड़ी सख्या इस घटना के प्रत्यक्ष दर्शी थे. दो अन्य मुख्य नेताओं बोड़ाह और पांडुआ हो’ को सेरेंगसिया घाटी के पास फांसी दी गई थी. यहां उत्तरी कोल्हान के लोग सार्वजनिक फांसी को देखने के लिए इकट्ठे हुए थे.

इसके बाद, विल्किन्सन को लंदन में बोर्ड द्वारा गंभीर रूप से व्याख्यान दिया गया था. क्योंकि उन्हें कमांडर के तौर पर अपने ही बनाये गए कैदियों का न्यायाधीश होना गलत था. उस समय, विल्किन्सन ने आशा व्यक्त की कि यह उदाहरण क्षेत्र में कई वर्षो तक शांति स्थापित करने में मददगार साबित होगी. इस तरह पोटो हो के नेतृत्व में सेरेंग्सिया में पहली लड़ाई जीती गई थी, जो इतिहास में सही तरीक़े से दर्ज नहीं हो पाई.

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