सुप्रीम कोर्ट से झारखंड सरकार को राहत, सारंडा के 31,468 हेक्टेयर क्षेत्र को सेंक्चुअरी घोषित करने की मंजूरी

Supreme Court allows Jharkhand Govt to declare 31,468 hectares of Saranda Forest as Sanctuary | Jharkhand News 2025

Ranchi (रांची) : झारखंड के प्रसिद्ध सारंडा वन क्षेत्र को वन्यजीव अभयारण्य घोषित करने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को अनुमति दे दी है कि वह लगभग 31,468 हेक्टेयर क्षेत्र को आधिकारिक तौर पर सारंडा वन्यजीव अभयारण्य (Saranda Wildlife Sanctuary) घोषित कर सकती है। यह फैसला लंबे समय से चल रहे कानूनी और प्रशासनिक विवादों के बाद आया है, जिससे सरकार को फिलहाल बड़ी राहत मिली है।

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काफी समय से लंबित था मामला

सारंडा वन को अभयारण्य घोषित करने का प्रस्ताव करीब एक दशक से लंबित था। 2022 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने सरकार को निर्देश दिया था कि पश्चिमी सिंहभूम जिले के इस घने सालवन क्षेत्र को संरक्षित क्षेत्र के रूप में अधिसूचित किया जाए। लेकिन खनन विभाग और पर्यावरण विभाग के बीच राय न बनने के कारण यह प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई।

सरकार ने बाद में अभयारण्य क्षेत्र बढ़ाने और साथ में सासनगदबुरु क्षेत्र को ‘कंजर्वेशन रिज़र्व’ घोषित करने का सुझाव भी दिया था। इन प्रस्तावों को लेकर कई विभागों में मतभेद पैदा हो गए, जिसके चलते मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया।

सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की देरी पर नाराज़गी जताई और कहा कि पर्यावरण संरक्षण के मामलों में इतनी लंबी ढिलाई अस्वीकार्य है। अदालत ने सरकार को स्पष्ट आदेश दिया कि एक सप्ताह के भीतर अभयारण्य अधिसूचना जारी करें, अन्यथा कठोर कार्रवाई की जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट ने साथ ही यह भी कहा कि पहले से वैध रूप से चल रही खनन गतिविधियों पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन नए खनन लीज़ अब इस क्षेत्र में नहीं दिए जाएंगे। अदालत ने राज्य सरकार से इस निर्णय पर अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Affidavit) दाखिल करने को भी कहा है।

सुप्रीम कोर्ट की अनुमति से बढ़ेगा संरक्षण क्षेत्र

सुप्रीम कोर्ट की इस अनुमति के बाद अब सरकार सारंडा के चुनिंदा हिस्सों को औपचारिक रूप से वन्यजीव अभयारण्य घोषित कर सकेगी। इस क्षेत्र में कई दुर्लभ प्रजातियों के जानवर और पक्षी पाए जाते हैं। यह इलाका एशिया का सबसे घना सागौन (Sal) वन भी कहलाता है।

खनन और पर्यावरण के बीच संतुलन की चुनौती

सारंडा का जंगल देश का सबसे बड़ा सालवन है और यहां आयरन ओर (Iron Ore) का विशाल भंडार मौजूद है। राज्य की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा खनन से जुड़ा है, जबकि दूसरी ओर यह इलाका हाथियों के कॉरिडोर, दुर्लभ वनस्पतियों और पारिस्थितिकी संतुलन के लिए बेहद अहम है।

खनन विभाग ने दलील दी थी कि अभयारण्य बनने से खनन से होने वाली आय और रोज़गार पर असर पड़ेगा, वहीं पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि सारंडा को अब और नुकसान झेलने की स्थिति में नहीं है। लगातार खनन, सड़क निर्माण और अवैध कटाई से यह जंगल सिकुड़ता जा रहा है।

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सरकार के सामने नई जिम्मेदारी

अब झारखंड सरकार के सामने चुनौती है कि वह अभयारण्य की सीमाओं को तय करते हुए स्थानीय समुदायों, वनवासियों और खनन कंपनियों के बीच संतुलन बनाए।
राज्य को वन्यजीव संरक्षण कानून, 1972 के तहत सभी आवश्यक प्रक्रियाएँ पूरी करनी होंगी — जिनमें ग्रामसभा की सहमति, मुआवजा प्रक्रिया और वन प्रबंधन योजना शामिल है। अभयारण्य घोषित होने के बाद इस क्षेत्र में शिकार, लकड़ी की कटाई और नई औद्योगिक गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध लागू होगा।

जैव विविधता और हाथियों का सुरक्षित ठिकाना

सारंडा वन झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले में स्थित है और यह क्षेत्र एशियाई हाथियों, तेंदुओं और अन्य वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास है। इस जंगल की हरियाली और समृद्ध जैव विविधता इसे भारत के सबसे महत्वपूर्ण इको-ज़ोन में शामिल करती है। विशेषज्ञों का मानना है कि अभयारण्य घोषित होने के बाद यहां मानव-वन्यजीव संघर्ष में भी कमी आएगी।

पर्यावरणीय और सामाजिक असर

सारंडा को अभयारण्य का दर्जा मिलने से हाथियों और अन्य जंगली जीवों के प्राकृतिक आवास को सुरक्षा मिलेगी।
यह क्षेत्र भविष्य में इको-टूरिज़्म और वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए भी नई संभावनाएँ खोलेगा। हालाँकि, विशेषज्ञों का मानना है कि स्थानीय जनजातीय आबादी की आजीविका पर असर को कम करने के लिए सरकार को वैकल्पिक योजनाएँ तैयार करनी होंगी।

पर्यावरणविदों ने फैसले का किया स्वागत

राज्य के पर्यावरणविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय का स्वागत किया है। उनका कहना है कि इससे झारखंड की प्राकृतिक धरोहर को संरक्षण मिलेगा और आने वाली पीढ़ियों के लिए सारंडा की हरियाली बनी रहेगी।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला झारखंड के लिए पर्यावरण संरक्षण की दिशा में ऐतिहासिक माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट की यह अनुमति न केवल झारखंड सरकार की जीत है, बल्कि देशभर के पर्यावरण प्रेमियों के लिए भी राहत की खबर है। अब उम्मीद की जा रही है कि सरकार शीघ्र ही अधिसूचना जारी कर सारंडा के संरक्षण की औपचारिक प्रक्रिया शुरू करेगी।

अब यह देखना होगा कि राज्य सरकार इस निर्णय को किस गति से लागू करती है और क्या वह खनन तथा संरक्षण दोनों के बीच संतुलन बना पाती है या नहीं।

http://सारंडा वन अभ्यारण्य: जल, जंगल और जमीन – किसके अधिकार में? – बिर सिंह बिरुली