Jamshedpur (जमशेदपुर) : गोपाल मैदान में शुक्रवार को प्रथम पूर्वी सिंहभूम साहित्य उत्सव 2026 का भव्य शुभारंभ देश और राज्य के प्रतिष्ठित जनजातीय व स्थानीय साहित्यकारों की उपस्थिति में दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। तीन दिनों तक चलने वाले इस साहित्यिक महोत्सव के पहले दिन बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी, विद्यार्थी और बुद्धिजीवी शामिल हुए।
उद्घाटन कार्यक्रम में उपायुक्त कर्ण सत्यार्थी, वरीय पुलिस अधीक्षक, उप विकास आयुक्त, एसडीएम धालभूम, पुलिस अधीक्षक ग्रामीण सहित कई प्रशासनिक अधिकारी मौजूद रहे।
साहित्य और समाज के बीच संवाद का मंच : डीडीसी
कार्यक्रम की शुरुआत में उप विकास आयुक्त नागेंद्र पासवान ने स्वागत भाषण देते हुए कहा कि इस आयोजन का उद्देश्य साहित्य और समाज के बीच संवाद को मजबूत करना और युवाओं को रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ना है। उन्होंने मुख्यमंत्री का संदेश पढ़ते हुए कहा कि सरकार चाहती है कि कोल्हान की भाषाओं और साहित्य को राष्ट्रीय पहचान मिले। उन्होंने सोबरन मांझी पुस्तकालय योजना सहित शिक्षा क्षेत्र में किए जा रहे प्रयासों की भी जानकारी दी।
सांस्कृतिक समृद्धि का सशक्त मंच बनेगा उत्सव : उपायुक्त
उपायुक्त कर्ण सत्यार्थी ने कहा कि यह उत्सव विभिन्न भाषाओं, साहित्य और कला को नजदीक से समझने का अवसर प्रदान करता है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि यह आयोजन रचनात्मक संवाद और सांस्कृतिक समृद्धि का स्थायी मंच बनेगा।
प्रथम सत्र: झारखंड आदिवासी साहित्य की विश्व दृष्टि
राष्ट्रीय साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार से सम्मानित डॉ. पार्वती तिर्की और डॉ. अनुज लुगुन ने आदिवासी साहित्य की वैश्विक दृष्टि पर अपने विचार रखे।
डॉ. तिर्की ने कहा कि आदिवासी साहित्य में वाचिक और लिखित दोनों परंपराएं रही हैं, जहां सामूहिक सृजन की भावना प्रमुख है। साहित्य समाज की सामूहिक चेतना से जुड़ा होता है।
डॉ. लुगुन ने कहा कि आदिवासी साहित्य में उपनिवेशवाद विरोधी ऐतिहासिक चेतना मौजूद है, जो इसे वैश्विक संघर्षों से जोड़ती है, लेकिन इसका समुचित मूल्यांकन अब भी नहीं हो पाया है।

द्वितीय सत्र: आदिवासी इतिहास का अध्याय
डोगरो बिरुली ने कहा कि जिस समाज में साहित्य नहीं होता, वह समाज जीवित नहीं रह सकता।
पूर्व विधानसभा अध्यक्ष प्रो. डी.एन. चांपिया ने कहा कि आदिवासी भाषाएं आधुनिक भाषाओं से कहीं अधिक प्राचीन हैं और प्रकृति से पोषित हैं। उन्होंने कहा कि कई आधुनिक शब्दों की जड़ें आदिवासी भाषाओं में मिलती हैं।
तृतीय सत्र: A Good Life – Lessons in Living and Leaving
अक्षय बाहिबाला और प्रसिद्ध लेखक जेरी पिंटो के बीच संवाद हुआ, जिसमें पैलियेटिव केयर की आवश्यकता और सामाजिक महत्व पर चर्चा की गई। जेरी पिंटो ने इसे मानवीय गरिमा से जुड़ा विषय बताते हुए इसके विस्तार पर जोर दिया।

चतुर्थ सत्र: ओलचिकी लिपि का शताब्दी वर्ष
जोबा मुर्मू, रानी मुर्मू, रविंद्र मुर्मू और वीर प्रताप मुर्मू ने ओलचिकी लिपि के विकास और गुरु गोमके पंडित रघुनाथ मुर्मू के योगदान पर प्रकाश डाला। वक्ताओं ने कहा कि पंडित मुर्मू ने संथाली साहित्य को नई पहचान दिलाई।
पंचम सत्र: कुडुख भाषा संरक्षण पर चर्चा
डॉ. नारायण उरांव ने कहा कि संस्कृति तभी बचेगी जब भाषा बचेगी और भाषा तभी बचेगी जब मातृभाषा में शिक्षा मिलेगी। उन्होंने तोलोंग सिकि लिपि के इतिहास और संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया।
षष्ठ सत्र: मजदूरों के शहर में साहित्य की पौध
अजय मेहताब और साहित्यकार जयनंदन के संवाद में जमशेदपुर के साहित्यिक योगदान पर चर्चा हुई। जयनंदन ने कहा कि शहर के लेखकों ने मजदूरों के जीवन, संघर्ष और संवेदनाओं को साहित्य में स्वर दिया है। उन्होंने नाट्यकर्मियों के लिए सुविधाओं की कमी पर भी चिंता जताई।
अंतिम सत्र: दास्तान-ए-रानी लक्ष्मीबाई
डॉ. हिमांशु वाजपेयी और प्रज्ञा शर्मा ने दास्तानगोई शैली में रानी लक्ष्मीबाई की कथा प्रस्तुत की, जिसे श्रोताओं ने खूब सराहा। शाम को कस्तूरबा विद्यालय सहित अन्य विद्यालयों के बच्चों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए।
कार्यक्रम के सफल संचालन में एसडीएम अर्नव मिश्रा, डीटीओ धनंजय, जिला जनसंपर्क पदाधिकारी पंचानन उरांव, जिला शिक्षा अधीक्षक आशीष पांडेय सहित कई अधिकारियों का योगदान रहा। पहले दिन का समापन स्थानीय साहित्यकारों की कवि गोष्ठी के साथ हुआ।
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