कुड़मी को ST में शामिल करने की मांग के लिए CM और MLA को दोषी ठहराना और आदिवासियों के खिलाफ साजिश रचने का आरोप लगाना राजनीति से प्रेरित

Chaibasa :- कुड़मी को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की कुड़मियों की मांग के लिए मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन, विधायकों को दोषी ठहराना और उन पर आदिवासियों के खिलाफ साजिश रचने का आरोप लगाना राजनीति से प्रेरित है. जो किसी भी तरह से उचित नहीं है. उक्त बातें झामुमो पश्चिमी सिंहभूम जिला समिति के सचिव सोनाराम देवगम ने कही.

उन्होंने कहा कि भारत का संविधान में अनुसूचित जनजातियों की कोई लिखित परिभाषा नहीं है. संविधान में दो रास्ते हैं जिसके द्वारा किसी जाति, जनजाति या आदिवासी समुदाय या उसके कुछ हिस्सों या समूह को अनुसूचित जनजातियों की सूची में शामिल या बाहर किया जा सकता है.


1. संविधान में राष्ट्रपति को यह शक्ति दिया गया है कि वह सम्बंधित राज्य या संघ राज्य क्षेत्र के राज्यपाल से परामर्श के पश्चात लोक अधिसूचना द्वारा किसी जाति जनजाति या जनजातियों या जनजातीय समुदायों या उसके कुछ हिस्सों या समूहों को, इस संविधान के प्रयोजनों के लिए उस राज्य के सम्बन्ध में अनुसूचित जनजाति के रूप में सूचीबद्ध कर सकता है.
2. संसद, विधि द्वारा किसी भी जनजाति या आदिवासी समुदाय या जनजातियों या आदिवासी समुदायों के कुछ हिस्सों या समूह को खण्ड -1 के तहत जारी लोक अधिसूचना में निर्दिष्ट अनुसूचित जनजातियों की सूची में शामिल या बाहर कर सकती है.

इससे यह स्पष्ट होता है कि किसी जाति, जनजाति या आदिवासी समुदायों या उसके कुछ हिस्सों या समूहों को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करने या कराने में अथवा बाहर करने या कराने में किसी भी राज्य सरकार या उस राज्य की विधानसभा के सदस्यों का कोई भी भूमिका नहीं है. यदि इसमें किसी की भूमिका है तो वह है राष्ट्रपति, राज्यपाल (अप्रत्यक्ष रूप से) और संसद (अर्थात अप्रत्यक्ष रूप से केन्द्र सरकार और सांसदों की).

उन्होंने कहा कि ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि कुड़मी को आदिवासी बनाने या अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की मांग के लिए हेमन्त सरकार और विधायकों को दोषी ठहराना कहां तक उचित है ? कुड़मी को आदिवासी बनाने या अनुसूचित जनजाति में शामिल करने की मांग पर विभिन्न आदिवासी समुदायों की स्वाभाविक प्रतिक्रिया हो सकती है और होनी भी चाहिए परन्तु चाईबासा में निकाली गई विरोध रैली में हेमन्त सरकार और विधायकों के खिलाफ नारेबाजी और पुतला दहन क्या औचित्य है ?

इस पर आदिवासी समाज को मंथन करने की आवश्यकता है कि विरोध के आड़ में कहीं हमारा राजनीतिक इस्तेमाल तो नहीं हो रहा है ? कहीं हमारे समाज को किसी दूसरी लड़ाई में उलझाए रख कर हमें अपने असली लक्ष्य से भटकाने का साजिश तो नहीं किया जा रहा है ? सभी आदिवासी संगठनों से आग्रह है कि समाज को सही दिशा और मार्गदर्शन देने का काम करें.

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