जेष्ठ जतरा महापर्व: रोहतासगढ़ की वीरांगनाओं की शौर्यगाथा आज भी जिंदा, चाईबासा में हर्षोल्लास से मनाया गया पर्व

चाईबासा में जेष्ठ जतरा महापर्व के दौरान पारंपरिक नृत्य करते उरांव समाज के लोग

चाईबासा, 02 मई: आदिवासी उरांव समाज की समृद्ध परंपरा, इतिहास और वीरता का प्रतीक जेष्ठ जतरा महापर्व इस वर्ष भी पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया गया। यह पर्व केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि रोहतासगढ़ की वीरांगनाओं की शौर्यगाथा को जीवित रखने का प्रतीक है।

रोहतासगढ़ की ऐतिहासिक गाथा से जुड़ा है जतरा

प्राचीनकाल में रोहतासगढ़ में आदिवासियों का स्वतंत्र राज्यशासन हुआ करता था, जहां उरांव समाज के राजा उरगन ठाकुर का शासन था। यह राज्य काफी समृद्ध था, जिसके कारण दुश्मनों की नजर हमेशा इस पर बनी रहती थी

कहा जाता है कि सरहुल पर्व के दिन मुगलों ने मौका देखकर रोहतासगढ़ पर हमला कर दिया। इस युद्ध में पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं ने भी अद्भुत साहस का परिचय दिया। राजा की पुत्री सिनगीदाई और सेनापति की पुत्री कैलीदाई के नेतृत्व में महिलाओं ने पुरुषों का वेष धारण कर युद्ध में हिस्सा लिया और मुगलों को पराजित कर दिया।

मुगलों ने रोहतासगढ़ को जीतने के लिए तीन बार आक्रमण किया, लेकिन हर बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इन तीनों जीतों की स्मृति में नीले झंडे पर तीन सफेद लकीरों का प्रतीक अपनाया गया, जो आज भी विजय का चिन्ह माना जाता है।

पहचान और परंपरा का प्रतीक

उरांव समाज में शरीर पर तीन लकीर गोदवाने की परंपरा भी इसी विजय से जुड़ी मानी जाती है, ताकि समाज के लोग देश-विदेश में कहीं भी हों, एक-दूसरे को पहचान सकें। यह परंपरा सामाजिक एकता और गौरव का प्रतीक है।

चाईबासा में जेष्ठ जतरा महापर्व के दौरान पारंपरिक नृत्य करते उरांव समाज के लोग
चाईबासा में परंपरा के साथ मनाया गया महापर्व

इसी ऐतिहासिक परंपरा को जीवित रखने के लिए चाईबासा के सातों अखाड़ों में जेष्ठ जतरा पर्व धूमधाम से मनाया गया। 1 मई को जागरण कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें युवतियों द्वारा खेत-खलिहानों से मिट्टी लाकर अखाड़ा भरा गया और रात भर पारंपरिक नृत्य-गान चलता रहा।

वहीं 2 मई को दोपहर 12 बजे से पहले अखाड़ा में विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई। बान टोला के पाहन (पुजारी) फागु खलखो ने सहयोगी दुर्गा कुजूर और मंगरू टोप्पो के साथ मिलकर पूजा संपन्न कराई।

समाज के प्रमुख लोग रहे उपस्थित

इस अवसर पर समाज के मुखिया लालू कुजूर, राजेंद्र कच्छप, शंभू टोप्पो, सीताराम मुंडा, चमरू लकड़ा, रवि तिर्की, बिरसा लकड़ा, लखन टोप्पो, बुधराम कोया, मथुरा कोया, कर्मा कुजूर, बंधन कुजूर, जगरनाथ टोप्पो, सूरज टोप्पो, अविनाश कुजूर, आकाश टोप्पो और सावन लकड़ा सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

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