सरायकेला में गूंजेगा ‘जय जगन्नाथ’ का उद्घोष, 16 जुलाई को निकलेगी ऐतिहासिक रथयात्रा, विधायक भी खींचेंगे प्रभु का रथ

सरायकेला रथयात्रा

सरायकेला। तीन शताब्दियों से भी अधिक समय से जनआस्था, संस्कृति और सामाजिक समरसता का संदेश देती आ रही सरायकेला की ऐतिहासिक उत्कलीय जगन्नाथ परंपरा इस वर्ष भी पूरे श्रद्धा, उल्लास और भव्यता के साथ जीवंत होने जा रही है। पुरी धाम की गौरवशाली परंपरा का अनुसरण करने वाली इस रथयात्रा को लेकर शहर में धार्मिक उत्साह का वातावरण बनने लगा है। श्री जगन्नाथ सेवा समिति के तत्वावधान में आयोजित होने वाले इस महापर्व की तैयारियां व्यापक स्तर पर जारी हैं। समिति के पदाधिकारी आयोजन को भव्य और सुव्यवस्थित बनाने में जुटे हैं, वहीं श्रद्धालुओं के बीच भी रथयात्रा को लेकर विशेष उत्सुकता देखी जा रही है।

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निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 14 जुलाई को भगवान श्रीजगन्नाथ, बलभद्र और माता सुभद्रा के नेत्रोत्सव का आयोजन किया जाएगा। इसके पश्चात 16 जुलाई को भगवान अपने दिव्य रथ पर आरूढ़ होकर मौसीबाड़ी के लिए प्रस्थान करेंगे। इस अवसर पर सरायकेला की सड़कें श्रद्धालुओं की भीड़ और जय जगन्नाथ के उद्घोष से गुंजायमान हो उठेंगी। रथयात्रा के दौरान सरायकेला राजपरिवार की प्राचीन परंपरा का निर्वहन करते हुए गजपति राजा प्रताप आदित्य सिंहदेव छेरा-पोंहरा की पावन रस्म अदा करेंगे। यह परंपरा इस संदेश का प्रतीक है कि प्रभु के समक्ष सभी समान हैं। इसके बाद हजारों श्रद्धालु रस्सी थामकर भगवान के रथ को मौसीबाड़ी तक खींचेंगे।

इस वर्ष रथ महोत्सव में पूर्व मुख्यमंत्री एवं स्थानीय विधायक चंपई सोरेन मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे। वे स्वयं श्रद्धालुओं के साथ भगवान जगन्नाथ के रथ को खींचकर इस ऐतिहासिक आयोजन में सहभागी बनेंगे। सोमवार को श्री जगन्नाथ सेवा समिति के अध्यक्ष लिपू महंती, सचिव शंकर, उपाध्यक्ष गोलक तथा सदस्य राजेश मिश्रा ने विधायक चंपई सोरेन से उनके आवास पर भेंट कर उन्हें औपचारिक रूप से रथ महोत्सव में शामिल होने का निमंत्रण दिया।

निमंत्रण स्वीकार करते हुए श्री सोरेन ने कहा कि सरायकेला की जगन्नाथ परंपरा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक एकता की मजबूत कड़ी है। उन्होंने कहा कि इस ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित रखने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने में समाज के प्रत्येक व्यक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका है। समिति द्वारा इस परंपरा को जीवंत बनाए रखने के लिए किए जा रहे प्रयास सराहनीय हैं।

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