Chaibasa (चाईबासा) : जिले में भीषण गर्मी और चिलचिलाती धूप का असर अब गांवों में साफ तौर पर दिखाई देने लगा है। तालाब, पोखर और नदियां तेजी से सूख रही हैं, जिससे पालतू मवेशियों के सामने पानी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
इस स्थिति ने पशुपालकों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी मवेशियों को खुले मैदान और खेतों में चराने की परंपरा है। घरों में चारा उपलब्ध कराने की व्यवस्था सीमित होने के कारण पशु पूरी तरह प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर रहते हैं। लेकिन लगातार बढ़ती गर्मी ने जलस्तर को काफी नीचे पहुंचा दिया है और घास की भारी कमी पैदा कर दी है।

शहर के आसपास के गांवों में हालात ज्यादा खराब हैं। कई तालाब और पोखर पूरी तरह सूख चुके हैं, जबकि कई सूखने की कगार पर हैं। रोरो नदी के किनारे बसे गांवों को कुछ राहत जरूर मिल रही है, लेकिन सुदूरवर्ती इलाकों में स्थिति बेहद चिंताजनक हो गई है। कई जगहों पर नाले और छोटे जलस्रोत भी समाप्त हो चुके हैं, जिससे चरवाहों को मवेशियों को दूसरे गांवों में ले जाकर पानी पिलाना पड़ रहा है।
गांवों में अधिकांश मवेशी अब गंदले पानी पर निर्भर हैं, जिससे जलजनित बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। इसके साथ ही खेतों में आग लगने और भीषण गर्मी के कारण हरे चारे की भी भारी कमी हो गई है।
चरवाहों की परेशानी
महुलसाई के रेंगो देवगम, गितिलपी के मरतोम सावैयां और रघुनाथपुर के प्रहलाद सावैयां ने बताया कि गर्मी में मवेशियों को ज्यादा पानी और चारे की जरूरत होती है, लेकिन गांवों के अधिकांश जलस्रोत सूख चुके हैं। मजबूरी में उन्हें दूर-दराज के गांवों में जाना पड़ रहा है।

चरवाहों के अनुसार, मवेशियों का स्वास्थ्य भी प्रभावित हो रहा है। उनका वजन कम हो रहा है और वे कमजोर होते जा रहे हैं। पहले जहां मवेशी करीब 10 घंटे तक चरते थे, अब यह समय घटकर लगभग 6 घंटे रह गया है। बाकी समय वे छांव में आराम करने को मजबूर हैं।
खूंटपानी प्रखंड के चीरू, गुंटिया और राजाबासा इलाकों में स्थिति और भी गंभीर है। यहां जलस्रोतों की भारी कमी है और जो थोड़ा पानी बचा है, वह भी गंदा है। ऐसे में पशुपालक किसी तरह अपने मवेशियों को बचाने की कोशिश कर रहे हैं।
स्थिति को देखते हुए स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभागों से जल्द राहत कार्य शुरू करने की मांग उठने लगी है, ताकि मवेशियों और ग्रामीणों को इस संकट से राहत मिल सके।
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