रांची में आयोजित द्वितीय राजभाषा दिवस-सह-कवि संगोष्ठी में साहित्यकारों ने लिया हो भाषा के संरक्षण और संवर्धन का संकल्प
Chaibasa (चाईबासा): झारखंड की समृद्ध आदिवासी भाषाई एवं सांस्कृतिक विरासत को सहेजने और हो भाषा के साहित्यिक विकास को गति देने के उद्देश्य से रविवार को रांची में आदिवासी हो द्वितीय राजभाषा दिवस-सह-कवि संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में हो भाषा के कवियों, साहित्यकारों, लेखकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, विद्यार्थियों और भाषा प्रेमियों ने हिस्सा लिया। इस दौरान हो भाषा के संरक्षण, संवर्धन और साहित्य के विस्तार को लेकर गंभीर चर्चा हुई।
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कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रसिद्ध कवि सूर्या सिंह बेसरा थे। समारोह की शुरुआत हो भाषा की वारंग क्षिति लिपि के सृजनकर्ता ओतगुरु लाको बोदरा की तस्वीर के समक्ष अतिथियों द्वारा अगरबत्ती प्रज्वलित कर की गई।

हो भाषा के साहित्य को और गति देने की जरूरत
मुख्य अतिथि सूर्या सिंह बेसरा ने कहा कि किसी भी भाषा के साहित्यिक विकास में उसकी अपनी लिपि की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उन्होंने कहा कि झारखंड सरकार ने वर्ष 2011 में हो भाषा को द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिया था, लेकिन इसके बावजूद हो भाषा के कवियों, लेखकों और साहित्यकारों की संख्या अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच सकी है। ऐसे में भाषा और साहित्य के विकास के लिए सामूहिक प्रयासों को और मजबूत करने की आवश्यकता है।

उन्होंने हो समाज के युवाओं और नए लेखकों से साहित्य सृजन के क्षेत्र में आगे आने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी जितना अधिक हो भाषा में लेखन और साहित्यिक गतिविधियों से जुड़ेगी, भाषा का भविष्य उतना ही मजबूत होगा।
सूर्या सिंह बेसरा ने ओतगुरु लाको बोदरा के योगदान को याद करते हुए कहा कि उन्होंने हो भाषा के लिए वारंग क्षिति लिपि का सृजन कर ऐतिहासिक कार्य किया। उनके योगदान को समाज और आने वाली पीढ़ियों को हमेशा याद रखना चाहिए।

आंदोलन के बाद मिला था द्वितीय राजभाषा का दर्जा
हो साहित्यकार डोबरो बुड़ीउली ने हो भाषा को द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिलाने के लिए किए गए आंदोलन और संघर्ष की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि हो भाषा के कवियों, लेखकों, साहित्यकारों और सामाजिक संगठनों के सामूहिक प्रयासों के परिणामस्वरूप भाषा को झारखंड में संवैधानिक सम्मान हासिल हुआ।
इस अवसर पर सामाजिक कार्यकर्ता सुषमा बुड़ीउली, रमेश सावैयां और शांति सावैयां ने भी हो भाषा और साहित्य से जुड़े विभिन्न विषयों पर अपने विचार रखे।
तीन साहित्यिक पुस्तकों का हुआ विमोचन
कार्यक्रम के दौरान हो भाषा और उससे जुड़े साहित्यिक विषयों पर केंद्रित तीन पुस्तकों का विमोचन किया गया। मुख्य अतिथि सूर्या सिंह बेसरा और अन्य अतिथियों ने पुस्तकों का लोकार्पण किया।
विमोचित पुस्तकों में ‘कोरं’ पत्रिका, ‘कोल्हान में हो भाषा की दावेदारी’ का अंग्रेजी अनुवाद तथा ‘हो भाषा पत्रकारिता : सरजोम उम्बुल’ शामिल हैं। वक्ताओं ने पुस्तकों के प्रकाशन को हो भाषा के साहित्यिक एवं पत्रकारिता विकास की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया।

कविताओं ने बांधा समां
कवि संगोष्ठी के दौरान हो और अंग्रेजी भाषा के कवियों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। भावपूर्ण और रसपूर्ण कविताओं ने श्रोताओं को प्रभावित किया और कवियों को खूब तालियां मिलीं।
कविता पाठ करने वालों में चंद्रिका कोडांकेल, काशराय कुदादा, तिलक बारी, रमेश सावैयां, युगल किशोर पिंगुवा और सुनीता कुंटिया शामिल रहीं। सुनीता कुंटिया ने अंग्रेजी भाषा में कविता प्रस्तुत की।
गीत-संगीत और नृत्य से जीवंत हुई आदिवासी संस्कृति
कार्यक्रम में टाटा कॉलेज टीआरएल के विद्यार्थियों ने हो सांस्कृतिक गीत प्रस्तुत किया। इसके बाद नगाड़ा और मांदर की थाप पर सामूहिक नृत्य ने समारोह में आदिवासी संस्कृति की जीवंत छटा बिखेर दी। सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने उपस्थित लोगों का मन मोह लिया।
समारोह में मानकी सावैयां, वीरसिंह बुड़ीउली, सुरेंद्र पुरती, सोनी बोयपाई, प्रीति देवगम, बागुन बोदरा, सुरेंद्र बुड़ीउली, विश्वनाथ जारिका, सुदर्शन सिंकू, दुर्योधन मुंदूइया, गुरुचरण सिंकू, श्रीराम हेंब्रम, सुनील हेंब्रम, उदय चंद्र बोदरा और यदूनाथ तियू समेत बड़ी संख्या में साहित्यकार, भाषा प्रेमी, सामाजिक कार्यकर्ता और समाज के लोग उपस्थित रहे।








