रांची की ओर निकला हो भाषा का कारवां, शब्दों में गूंजेगी अपनी माटी की आवाज

हो भाषा दिवस

चाईबासा। अपनी भाषा, संस्कृति और साहित्य के संरक्षण के संकल्प के साथ रविवार को चाईबासा से हो भाषा प्रेमियों का कारवां रांची के लिए रवाना हुआ। हाथों में साहित्य की किताबें, मन में मातृभाषा के प्रति गहरा लगाव और हो समाज की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने का सपना लिए पश्चिमी सिंहभूम के साहित्यकार, कवि, लेखक और भाषा प्रेमी रांची में आयोजित होने वाले आदिवासी हो भाषा दिवस समारोह-सह-कवि संगोष्ठी में भाग लेने के लिए निकले।

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हो भाषा दिवस

रविवार सुबह तांबो चौक पर साहित्यकारों और भाषा प्रेमियों को विदा करने के लिए आदिवासी सामाजिक संगठनों के लोग पहुंचे। इस दौरान आत्मीय और भावुक माहौल देखने को मिला। लोगों ने रांची जा रहे साहित्यकारों को शुभकामनाएं दीं। चारपहिया वाहनों से जब साहित्यकार रांची की ओर रवाना हुए तो ऐसा लगा मानो चाईबासा की धरती से हो भाषा और साहित्य की आवाज राजधानी की ओर बढ़ रही हो।

इस अवसर पर विदाई देने वालों में आदिवासी हो समाज महासभा के पूर्व पदाधिकारी सुशील कुमार पुरती, आदिवासी हो समाज महासभा सेवानिवृत्त संगठन के चैतन्य कुंकल, कृष्ण चंद्र बुड़ीउली, रमय पुरती, उदय चंद्र हेंब्रम, पूर्व ग्राम मुंडा महावीर बुड़ीउली और केरसे देवगम सहित अन्य लोग मौजूद रहे।

साहित्यकारों और विद्यार्थियों का दल रवाना

रांची जाने वाले प्रतिनिधिमंडल में हो भाषा के साहित्यकार डोबरो बुड़ीउली, तिलक बारी, काशराय कुदादा, मानकी सावैयां, सुनील हेंब्रम, उदय चंद्र बोदरा, चंद्रिका कोडांकेल, रमेश सावैयां, बबलू सावैयां, सुरेंद्र पुरती, इंदू तियू और वीरसिंह बुड़ीउली सहित अन्य साहित्य प्रेमी शामिल हैं। इनके अलावा टाटा कॉलेज, चाईबासा के टीआरएल विभाग के छात्र-छात्राएं भी कार्यक्रम में भाग लेने के लिए रांची रवाना हुए।

सभी प्रतिभागी रांची के धुर्वा स्थित पुराने विधानसभा भवन के अतिथि सभागार में आयोजित हो भाषा दिवस समारोह-सह-कवि संगोष्ठी में हिस्सा लेंगे। कार्यक्रम में हो भाषा, साहित्य, संस्कृति और उसके संरक्षण से जुड़े विभिन्न विषयों पर विचार-विमर्श और काव्य पाठ होगा।

भाषा केवल शब्द नहीं, हमारी पहचान है

हो भाषा साहित्यकार डोबरो बुड़ीउली ने कहा कि पश्चिमी सिंहभूम जिले से बड़ी संख्या में हो समुदाय के लेखक, कवि, साहित्यकार और भाषा प्रेमी इस आयोजन में शामिल होने के लिए रांची जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि अपनी भाषा और साहित्य की समृद्ध विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना सभी की जिम्मेदारी है।

उन्होंने कहा, “भाषा केवल शब्द नहीं है, बल्कि हमारी पहचान, संस्कृति और अस्तित्व से जुड़ी हुई है। इसे संरक्षित और समृद्ध करने के लिए निरंतर प्रयास जरूरी है।”

हो भाषा दिवस जैसे आयोजन न केवल साहित्यकारों और भाषा प्रेमियों को एक मंच प्रदान करते हैं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी मातृभाषा और सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।SEO शीर्षक: रांची की ओर निकला हो भाषा का कारवां, राजभाषा दिवस समारोह में शामिल होंगे चाईबासा के साहित्यकार

 

http://चिरगेल सनंग पुस्तक विमोचन: हो भाषा के लिए ऐतिहासिक और गर्वपूर्ण क्षण

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