चक्रधरपुर: खेती में सफलता के लिए अधिक खर्च करना जरूरी नहीं है, बल्कि सही तकनीक और बेहतर प्रबंधन से भी अच्छी कमाई की जा सकती है। पश्चिमी सिंहभूम जिले के चक्रधरपुर प्रखंड अंतर्गत बिंडासोर्जोम गांव की महिला किसान बलेमा सामड ने प्राकृतिक खेती अपनाकर इस बात को साबित किया है। उन्होंने महज एक एकड़ जमीन पर विभिन्न सब्जियों और मक्का की खेती कर 53 हजार रुपये का शुद्ध लाभ अर्जित किया है। उनकी यह उपलब्धि क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणादायक बन रही है।
राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन मिलने के बाद बलेमा सामड ने पारंपरिक खेती के साथ प्राकृतिक कृषि पद्धति को अपनाया। इसका उद्देश्य खेती की लागत कम करना, रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर निर्भरता घटाना तथा कम जमीन से बेहतर आमदनी हासिल करना था।

### करेला, बरबटी, झींगा और नेनुआ की खेती से बढ़ी आमदनी
बलेमा सामड ने अपने एक एकड़ खेत में करेला, बरबटी, झींगा, नेनुआ और मक्का जैसी फसलों की खेती की। उन्होंने फसलों के पोषण और कीट प्रबंधन के लिए बीजामृत, जीवामृत, घनजीवामृत, नीमास्त्र और सुपर कम्पोस्ट जैसे प्राकृतिक जैव-आदानों का इस्तेमाल किया।
प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित इन तकनीकों को अपनाने से उन्हें बाजार से रासायनिक खाद और कीटनाशक खरीदने पर होने वाले खर्च को कम करने में मदद मिली। साथ ही, एक ही खेत में अलग-अलग फसलों की खेती करने से आमदनी के कई स्रोत भी तैयार हुए।
### 12 हजार रुपये की लागत में 65 हजार रुपये की कुल आय
जून 2026 में बुवाई के बाद बलेमा सामड ने सब्जियों की 18 बार व्यावसायिक तुड़ाई की। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, एक एकड़ भूमि से लगभग 1,800 किलोग्राम उपज प्राप्त हुई।
खेती पर कुल 12 हजार रुपये खर्च हुए, जबकि मुख्य फसलों से 55 हजार रुपये और सह-फसलों से 10 हजार रुपये की आय हुई। इस तरह उनकी कुल आमदनी 65 हजार रुपये रही। कुल आय में से खेती की लागत घटाने के बाद उन्हें 53 हजार रुपये का शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ।
यह उदाहरण बताता है कि फसल विविधीकरण, प्राकृतिक कृषि पद्धतियों और बेहतर प्रबंधन के माध्यम से छोटे किसान भी सीमित संसाधनों में अपनी आमदनी बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
### उपायुक्त ने प्राकृतिक खेती को बताया उपयोगी
पश्चिमी सिंहभूम के उपायुक्त मनीष कुमार ने कहा कि प्राकृतिक खेती और फसल विविधीकरण किसानों की उत्पादन लागत कम करने तथा उनकी आजीविका को मजबूत बनाने में सहायक हैं। ऐसी कृषि पद्धतियों को प्रोत्साहित करने से किसानों को खेती के वैकल्पिक तरीकों को अपनाने का अवसर मिलता है।
वहीं, महिला किसान बलेमा सामड ने अन्य किसानों से भी प्राकृतिक खेती की तकनीकों को अपनाने की अपील की। उनकी सफलता यह संदेश देती है कि उचित प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन और खेती की लागत पर नियंत्रण के जरिए कृषि को अधिक लाभकारी बनाया जा सकता है।
बलेमा सामड की यह उपलब्धि न केवल महिला किसानों के आत्मनिर्भर बनने की मिसाल है, बल्कि पश्चिमी सिंहभूम जिले में टिकाऊ और कम लागत वाली खेती को बढ़ावा देने की संभावनाओं को भी उजागर करती है।







