सारंडा में कुरकुट व्यवसाय ने थाम रखा है ग्रामीणों के सांसों की डोर, कुरकुट बेचकर जीविका चलाते हैं सैकड़ों परिवार

Chaibasa : नक्सल प्रभावित सारंडा जंगल आज भले ही अपनी प्राकृतिक सौंदर्य और विराट साल वन के लिये एशिया प्रशिद्ध हो. लेकिन यहां का आम जीवन आज भी सरकारी सुविधाओं के अभाव में सिसकती-रेंगती हुई दिखती है. मिट्टी व घास-फूस के टूटे-फूटे मकान, गांवों में गुम हो चुकीं जर्जर सड़कें, मरम्मत के अभाव में खराब पड़े चापाकल, इधर-उधर धमाचौकड़ी करते नंग-धड़ंग व कुपोषित बच्चे गांव की बदहाली को बयां करते हैं. यह दुर्दशा तथा कथित विकास रथ पर सवार सरकार के मुंह पर तमाचा है, तो वहीं सरकारी अफसरों की उदासीनता का भी यह प्रमाण हैं. बावजूद इसके सरकारी की तंद्रा भंग नहीं हो रही है.

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स्कूल छोड़ कुरकुट बेचने को विवश हैं बच्चे

रोजगार के अभाव में सारंडा के ग्रामीण आज भी पत्ते, दात्तुन, कुरकुट आदि बेचकर जीवन की गाड़ी खींचने को बाध्य हैं. अब तो कुरकुट बेचने में बच्चे भी जुट गये हैं. इससे वे स्कूली शिक्षा से वंचित हो रहे हैं. ग्रामीण इलाकों के साप्ताहिक हाट बाजारों में बच्चों का कुटकुट बेचना आम है. ग्रामीण बताते हैं कि उनके अभिभावक ही ऐसा करने को विवश करते हैं. एक बच्चा दिनभर में कुटकुट बेचकर करीब डेढ़ से दो सौ रुपये तक कमा लेता है. कुरकुट बेचने की यहां दशकों पुरानी परंपरा है. लेकिन बच्चों के इसमें उतरने की शुरुआत कोरोनाकाल के दौरान हुई थी जो अब तक चल रही है. बच्चे भी बताते हैं कि कुटकुट बेचना उनका शौक नहीं, विवशता है. ऐसा करके घर चलाने में वे माता-पिता की मदद करते हैं.

ज्ञात हो कि तालाबुरु जंगल, नोवामुंडी जंगल, टोंटो जंगल आदि में कुटकुट बहुतायत में मिलता है. ग्रामीण यहीं से पेड़ों से उतारकर उसे हाट-बाजारों में बेचते हैं. कुरकुट को अदरख, लहसुन, प्याज आदि के साथ पीसकर चटनी बनाया जाता है. कोल्हान में कुरकुट चटनी ग्रामीण इलाकों में भोजन का पारंपरिक अंग है.

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