सारंडा में उग्र हुआ रांजाबुरु खदान आंदोलन, संघर्ष की रात बनी प्रतिरोध की पहचान

सारंडा रांजाबुरु खदान आंदोलन

गुवा संवाददाता। सारंडा के घने जंगल एक बार फिर आदिवासी असंतोष और प्रतिरोध के गवाह बने हैं। 23 फरवरी को रांजाबुरु खदान को बंद कर शुरू हुआ आंदोलन 24 फरवरी को दूसरे दिन और अधिक उग्र रूप में सामने आया। यह अब केवल धरना-प्रदर्शन नहीं, बल्कि हक और अस्तित्व की खुली लड़ाई बन चुका है। आंदोलनकारियों का साफ कहना है— “हम भूखे रह लेंगे, लेकिन अपना अधिकार नहीं छोड़ेंगे।”

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सारंडा रांजाबुरु खदान आंदोलन

खुले आसमान के नीचे डटे रहे ग्रामीण

बीती रात आंदोलनकारियों के लिए कठिन परीक्षा साबित हुई। खुले आसमान के नीचे सैकड़ों ग्रामीण— जिनमें मानकी, मुंडा, मुखिया, महिलाएं, बुजुर्ग और युवा शामिल थे— जंगल के बीच डटे रहे। अचानक हुई बारिश, कड़ाके की ठंड और जंगली जानवरों की आवाजों के बीच पूरी रात प्रतिरोध जारी रहा।

कुछ लोगों ने आग जलाकर ठंड से बचने की कोशिश की, तो कई लोग पूरी रात जागते रहे ताकि किसी अनहोनी से साथियों की रक्षा कर सकें। सुबह होते ही आंदोलन स्थल पर नारे गूंज उठे—
“हमारी जमीन, हमारा हक”
“रोजगार नहीं तो खनन नहीं”

रात की कठिनाइयों ने आंदोलन को कमजोर नहीं, बल्कि और मजबूत बना दिया।

सारंडा रांजाबुरु खदान आंदोलन

सुविधाओं के अभाव का आरोप

आंदोलनकारियों ने आरोप लगाया कि पानी और चिकित्सा सुविधा की कोई व्यवस्था नहीं की गई। महिलाओं और बुजुर्गों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। उनका कहना है कि जिस क्षेत्र से देश को लोहा मिलता है, उसी क्षेत्र के लोग आज बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं।

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रोजगार और अस्तित्व की मांग

ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि जब जंगल और खेती संकट में हैं, तब खदान ही रोजगार की अंतिम उम्मीद है। यदि स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता नहीं मिली, तो आंदोलन और तेज होगा।

सारंडा क्षेत्र में जारी यह आंदोलन अब प्रशासन और खनन प्रबंधन के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। आने वाले दिनों में स्थिति किस दिशा में जाती है, इस पर पूरे इलाके की नजर टिकी हुई है।

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