मुर्गी, बत्तख, बकरी और मछली पालन के साथ बागवानी से बनाई पहचान, जंगल को पार्क और फैमिली रेस्टोरेंट का दिया स्वरूप
Chaibasa (चाईबासा) : झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के झींकपानी प्रखंड अंतर्गत माटागुटू गांव के 58 वर्षीय किसान महावीर बुड़ीउली ने मेहनत, लगन और दूरदर्शिता से स्वरोजगार की मिसाल पेश की है। पारंपरिक खेती से आगे बढ़ते हुए उन्होंने मुर्गी पालन, बत्तख पालन, बकरी पालन, मत्स्य पालन और बागवानी को अपनी आय का आधार बनाया है। उनके अनुसार, इन गतिविधियों से उन्हें सालाना करीब नौ लाख रुपये की आमदनी होती है।
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नौ एकड़ जमीन पर विकसित किया बहुआयामी व्यवसाय
महावीर बुड़ीउली का व्यवसाय लगभग नौ एकड़ जमीन में फैला है। परिसर में चार बड़े निजी तालाब हैं, जहां मछली पालन के साथ बत्तख पालन भी किया जाता है। इसके अलावा बकरी और मुर्गी पालन के जरिए भी वे अपनी आमदनी बढ़ा रहे हैं।
उनके बगीचे में संतरा, नींबू, आम, केला और पपीता जैसे फलदार पौधे लगे हैं। साथ ही विभिन्न प्रकार की साग-सब्जियों की खेती भी की जाती है। पशुपालन, मत्स्य पालन और बागवानी को एक साथ जोड़कर उन्होंने अपने स्वरोजगार का दायरा बढ़ाया है।

जंगल और पहाड़ी क्षेत्र को बनाया पार्क व फैमिली रेस्टोरेंट
महावीर बुड़ीउली ने अपनी पुश्तैनी जमीन पर मौजूद तालाबों और आसपास के प्राकृतिक क्षेत्र को विकसित कर एक नए व्यावसायिक स्वरूप में ढाला है। छोटी पहाड़ियों से घिरे इलाके की जमीन को उपयोगी बनाने और उसे आय का साधन बनाने के लिए उन्होंने लाखों रुपये खर्च किए।
यहां उन्होंने ‘मोरा हो मेमोरियल बोटेनिकल पार्क एवं रेस्टोरेंट’ शुरू करने की पहल की है। रेस्टोरेंट में शाकाहारी और मांसाहारी व्यंजन उपलब्ध हैं। इस पहल से खेती और पशुपालन के अलावा पर्यटन तथा खानपान के क्षेत्र में भी स्वरोजगार का अवसर तैयार हुआ है।
आदिवासी हो समाज ने किया सम्मानित
स्वरोजगार के क्षेत्र में उनके प्रयासों को देखते हुए रविवार को आदिवासी हो समाज के बुद्धिजीवियों ने पुष्पगुच्छ और अंगवस्त्र देकर महावीर बुड़ीउली को सम्मानित किया। पार्क का उद्घाटन हो साहित्यकार डोबरो बुड़ीउली ने आदिवासी रीति-रिवाज के अनुसार फीता काटकर किया।
कार्यक्रम में माटागुटू के ग्राम मुंडा चिरिया बुड़ीउली, टूटूगुटू के मुंडा ब्रजमोहन पुरती, डीएसपी समीर सावैयां, सामाजिक कार्यकर्ता कुसुम केराई, संजय बुड़ीउली, बबलू सावैयां, अविनाश कोड़ाह, तुरी सुंडी, सुखलाल पुरती, विश्वनाथ तामसोय, अशोक सुंडी, रामेश्वर सावैयां और तिलक बारी सहित अन्य लोग उपस्थित थे।

स्वरोजगार से बच्चों की उच्च शिक्षा में मिली मदद
महावीर बुड़ीउली ने बताया कि करीब 15 वर्ष पहले उन्होंने छोटे स्तर पर स्वरोजगार की शुरुआत की थी। धीरे-धीरे अपने संसाधनों और कमाई का उपयोग करते हुए व्यवसाय का विस्तार किया। उनके मुताबिक, इस पूरी यात्रा में उन्होंने सरकारी सहायता के बजाय अपनी पूंजी का निवेश किया।
स्वरोजगार से होने वाली आमदनी का सकारात्मक असर उनके परिवार पर भी पड़ा है। उनकी बेटी मौसमी सिंधु बुड़ीउली बीआईटी मेसरा में कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई कर रही हैं, जबकि बेटा मोहित शेखर बुड़ीउली बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, रांची में अध्ययनरत है।
महावीर बुड़ीउली की यह पहल दिखाती है कि खेती-किसानी को पशुपालन, मत्स्य पालन, बागवानी और स्थानीय पर्यटन से जोड़कर ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर तैयार किए जा सकते हैं। उनका प्रयास स्थानीय युवाओं और किसानों के लिए स्वरोजगार की संभावनाओं को समझने का एक उदाहरण है।
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