Chaibasa (चाईबासा) : जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, चाईबासा ने प्रसूता की मौत से जुड़े चर्चित चिकित्सकीय लापरवाही के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। आयोग के अध्यक्ष और महिला सदस्य ने बहुमत से आशा नर्सिंग होम के संचालक एवं जनरल सर्जन डॉ. अरुण कुमार को सेवा में कमी और चिकित्सकीय लापरवाही का दोषी मानते हुए मृतका के पति को 10 लाख रुपये मुआवजा तथा 1 लाख रुपये मुकदमेबाजी खर्च, कुल 11 लाख रुपये देने का आदेश दिया है। हालांकि आयोग के पुरुष सदस्य ने अलग मत व्यक्त करते हुए शिकायत को खारिज करने की राय दी।
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मामला ओडिशा के मयूरभंज जिले के देवगाम निवासी सत्यनारायण बोइपाई की शिकायत से जुड़ा है। शिकायत के अनुसार उनकी पत्नी सुनीता देवगम को 11 जून 2024 को प्रसव पीड़ा के बाद आशा नर्सिंग होम में भर्ती कराया गया था। आरोप है कि बिना आवश्यक विशेषज्ञों और निर्धारित चिकित्सा प्रोटोकॉल का पालन किए सीजेरियन ऑपरेशन किया गया, जिससे अत्यधिक रक्तस्राव हुआ। बाद में उन्हें टीएमएच जमशेदपुर और फिर रिम्स रांची रेफर किया गया, जहां 17 जून 2024 को इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई।

सुनवाई के दौरान डॉ. अरुण कुमार ने सभी आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि मरीज पहले से ही अत्यंत गंभीर स्थिति में थी। प्लेसेंटल एब्रप्शन जैसी जटिलताओं के कारण आपातकालीन ऑपरेशन करना जरूरी था और शिशु का सुरक्षित जन्म हुआ। उनके अनुसार मरीज की मौत सेप्टिक शॉक, एमओडीएस और डीआईसी जैसी गंभीर चिकित्सकीय जटिलताओं के कारण हुई, न कि किसी लापरवाही से।
दोनों पक्षों ने आयोग के समक्ष दस्तावेजी और मौखिक साक्ष्य प्रस्तुत किए। बहुमत के फैसले में अध्यक्ष और महिला सदस्य ने कहा कि स्वतंत्र विशेषज्ञ राय उपलब्ध नहीं होने के बावजूद प्रस्तुत साक्ष्यों और परिस्थितियों से यह स्पष्ट होता है कि उपचार के दौरान आवश्यक चिकित्सा मानकों का समुचित पालन नहीं किया गया। इसे सेवा में कमी और चिकित्सकीय लापरवाही मानते हुए आयोग ने 45 दिनों के भीतर 11 लाख रुपये भुगतान करने का आदेश दिया। निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं होने पर पूरी राशि पर 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।
वहीं आयोग के पुरुष सदस्य ने अपने असहमति मत में कहा कि केवल मरीज की मृत्यु हो जाने से चिकित्सकीय लापरवाही सिद्ध नहीं होती। उन्होंने सिविल सर्जन की जांच रिपोर्ट, रिम्स की विशेषज्ञ राय और चिकित्सा अभिलेखों का हवाला देते हुए कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों से चिकित्सकीय लापरवाही साबित नहीं होती। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के कई महत्वपूर्ण फैसलों का उल्लेख करते हुए शिकायतकर्ता के 25.40 लाख रुपये के दावे को खारिज करने की राय दी।
मतभेद के बावजूद आयोग में बहुमत का निर्णय प्रभावी होने के कारण शिकायत आंशिक रूप से स्वीकार कर ली गई और शिकायतकर्ता को कुल 11 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश पारित किया गया।







