“बेबसी की इंतहा: जो विभाग दूसरों को सुरक्षा देने का दावा करता है, आज वह खुद असुरक्षित है। चाईबासा के बेनीसागर में हाथी के हमले से एक वनकर्मी की दर्दनाक मौत ने यह साबित कर दिया है कि वन विभाग के पास न तो हाथियों को रोकने की कोई ठोस रणनीति है और न ही अपने कर्मचारियों को बचाने के पुख्ता इंतजाम। जब रक्षक ही भक्षक बने गजराज के आगे लाचार हो, तो आम जनता की सुरक्षा भगवान भरोसे ही है।”
Chaibasa (चाईबासा) : पश्चिमी सिंहभूम के बेनीसागर में जंगली हाथी ने खूनी खेल जारी रखते हुए एक वन विभाग के कर्मचारी घायल हो गया और दो लोगों की जान ले ली है। जिले में पिछले 9 दिनों के भीतर हाथियों के हमले में मरने वालों का आधिकारिक आंकड़ा अब 22 पहुंच गया है।
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चाईबासा में हाथी का तांडव: 9 दिनों में 21वीं जान, मासूम को दांत में फंसाकर पटक रहा गजराज

ताजा घटनाक्रम: वनकर्मी भी नहीं बचा
शुक्रवार सुबह करीब 12.30 बजे, जब वन विभाग की टीम और ग्रामीण हाथी को खदेड़ने का प्रयास कर रहे थे, तभी हाथी ने एक वनकर्मी को अपनी चपेट में ले लिया और पटक-पटक कर गंभीर रूप से घायल कर दिया। ग्रामीणों ने साहस दिखाते हुए उसे हाथी से छुड़ाकर सड़क किनारे लाया और अस्पताल ले गए। जंहा इलाज के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया।
बीती रात सीमा पर कोहराम
ग्रामीणों के अनुसार, यह हाथी बीती रात से ही उत्पात मचा रहा है। झारखंड-ओडिशा सीमा पर स्थित गांवों में भी कल रात हाथी ने दो लोगों को कुचलकर मार डाला था।, लेकिन इस बात की अभी पुष्टि नहीं हुई है। सुबह होते-होते हाथी बेनीसागर और तिलोकुटी क्षेत्र में दाखिल हुआ, जहां उसने दो ग्रामीण और अब एक वनकर्मी को अपना शिकार बनाया है।
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एक दुर्घटना नहीं, बल्कि एक सरकारी तंत्र की विफलता का प्रमाण
चाईबासा के बेनीसागर से आई हालिया तस्वीर केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि एक सरकारी तंत्र की विफलता का प्रमाण है। जब एक गजराज पूरे जिले को बंधक बना ले और सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाला वन विभाग खुद अपने कर्मचारी को न बचा पाए, तो समझ लीजिए कि स्थिति ‘खतरे के निशान’ को पार कर चुकी है।
खोखली साबित हुई सुरक्षा की रणनीति
हाथियों को खदेड़ने के नाम पर हर साल करोड़ों का बजट खर्च होता है, लेकिन जमीन पर नतीजा क्या है? 9 दिनों में 22 मौतें! यह कोई साधारण आंकड़ा नहीं है, यह एक मानवीय त्रासदी है। वन विभाग अक्सर दावा करता है कि उनके पास ‘क्विक रिस्पांस टीम’ (QRT) है, लेकिन हकीकत यह है कि जब हाथी गांव में घुसता है, तो विभाग के पास केवल टॉर्च और पटाखों के अलावा कुछ नहीं होता।
जब ‘रक्षक’ ही लाचार है…
बेनीसागर की घटना ने वन विभाग की पोल खोल कर रख दी है। विभाग जो जनता को हाथियों से बचाने का वादा करता है, आज उसका अपना ही कर्मचारी हाथी के पैरों तले कुचल दिया गया। यह कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा कि जो विभाग सुरक्षा देने वाला है, वह आज खुद सबसे ज्यादा असुरक्षित है। जब विभाग अपने प्रशिक्षित कर्मियों को सुरक्षा उपकरण और सही ट्रेनिंग नहीं दे पा रहा, तो आम ग्रामीणों से यह उम्मीद करना कि वे खुद का बचाव कर लेंगे, बेईमानी है।
ओडिशा सीमा पर समन्वय का अभाव
ग्रामीणों की मानें तो हाथी बीती रात से ही झारखंड-ओडिशा सीमा पर मौत बांट रहा था। सवाल यह है कि जब हाथी की लोकेशन ट्रैकिंग की सुविधा उपलब्ध है, तो समय रहते गांवों को अलर्ट क्यों नहीं किया गया? क्यों प्रशासन तब जागता है जब लाशें सड़क पर बिछ जाती हैं?
मुआवजे से नहीं, समाधान से बचेगी जान
सरकार मौतों के बाद मुआवजे का मरहम लगा देती है, लेकिन क्या किसी की जान की कीमत चार लाख रुपये है? कोल्हान की जनता को मुआवजा नहीं, बल्कि हाथियों के आतंक से ‘मुक्ति’ चाहिए। हाथियों के कॉरिडोर की मैपिंग, ट्रेंकुलाइजिंग गन्स की उपलब्धता और हाथियों को रिहायशी इलाकों से दूर रखने के लिए सौर बाड़ (Solar Fencing) जैसे स्थायी समाधानों पर धूल जम रही है।
निष्कर्ष
चाईबासा में 22 परिवारों के चूल्हे बुझ चुके हैं। डीएफओ का घटनास्थल पर पहुंचना और हाथी को खदेड़ने का आश्वासन देना अब नाकाफी लगता है। अगर अब भी वन विभाग अपनी सुस्ती और पुरानी तकनीकों से बाहर नहीं निकला, तो यह ‘मानव-हाथी संघर्ष’ आने वाले दिनों में और भी कई बेगुनाहों को निगल जाएगा। अब वक्त केवल शोक जताने का नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का है।
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